चौक-चौराहे क्या आज घर-घर में,
रिश्तों का बलात्कार हुआ है.
मगर हादसा का संगीन मामला
हमारी नजरों से दरकिनार हुआ है.

शिकायत शायद यह अनचाही हो,
जीजाओं-चाचाओं को क्यों बदनाम करें
सगे भाई-बाप के पापों से
रिश्तों का दामन दागदार हुआ है.

उजाले के उपदेशकों ने भी,
अँधेरे का भरपूर लाभ उठाया है
ज्ञान-योग की छत के नीचे
वेश्यालयों का भरमार हुआ है.

सियासियों की बात मत पूछो,
सेक्स आज व्यापार हुआ है.
उनकी कृपा से विदेशी बैंक आज
स्वदेशी का राजदार हुआ है.

धर्म का धंधा कभी होता न मंदा
हाईटेक भगवान तैयार हुआ है
लुटवाए मूर्खों के मुख से
उनका जयजयकार हुआ है.

बदल गई परिभाषा सदाचार की
हर मोड़ पर भ्रष्टाचार पहरेदार हुआ है.
मानवता की आखिरी चीर
तार-तार सौ बार हुआ है.


पी.बिहारी बेधड़क
कटाक्ष कुटीर, महाराजगंज
मधेपुरा.
2 Responses
  1. आपकी यह पोस्ट आज के (०८ जून, २०१३) ब्लॉग बुलेटिन - हबीब तनवीर साहब - श्रद्धा-सुमन पर प्रस्तुत की जा रही है | बधाई


  2. बहुत-बहुत शुक्रिया...तुषार जी.


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