मैं रेगिस्तानी लड़की हूँ। तमाम रेगिस्तानी लड़कियों की तरह कोई दिन पहाड़ों पर बीताने की मन्नत मांगती आयी हूँ। आज जो मन्नत पूरी हुई है और मैं मसूरी के रास्तों पर हूँ तो मुझे मेरा रेगिस्तान याद आ रहा है। रात के पहले ही पहर में कैसे मेरी रवानगी के साथ ही ठंडा पड़ गया था। एक पल को मैं रुककर उससे कहना चाहती थी कि रेगिस्तान मेरे! देखने को चाहे जहान बचा रहे, ठहरने को तो तू ही रहेगा। मैं  जल्द लौटूंगी; इस आस में कि तेरी मिट्टी का ये अनछुआ ममत्व सदा बरकरार रहेगा।

खैर! छोड़िए। अब पहाड़ों पर हैं तो इन्हीं की बात करते हैं। मैं एक मिनी बस में हूँ जिसमें और भी लोग हैं। लेकिन सबके बीच बैठकर अकेले सैर पर निकलना कितना आसान काम है, ये दुनिया के सारे कोनों में मौजूद अंतर्मुखी लोग बखूबी जानते हैं।

इस बस का ड्राईवर एक नेपाली लड़का है। उसकी आंखें धंसे हुए नाक वाले चेहरे पर लकीरों जैसी चमकती है। वो अच्छी हिंदी बोलता है और इन घुमावदार सड़कों पर बेहद कुशलता से बस चलाता है।

मैं लड़के को देखकर सोच रही हूँ कि किसी दिन ये भी  बस चलाना छोड़कर पहाड़ों की रानी मसूरी में अपने दिल की रानी के साथ आता होगा। वे दोनों हाथ पकड़कर घंटों किसी नदी को बहता हुआ देखते होंगे और ढेरों बातें करते होंगे। उनकी बातों में हम जैसे किसी सैलानी का जिक्र नहीं होता होगा; बल्कि उन जगहों का जिक्र होता होगा जिन्हें वो खुद सैलानी बनकर देखना चाहते हैं। फिर वो जगह मेरा रेगिस्तान भी हो सकता है।

मसूरी अभी 18 किलोमीटर और उपर है। मैं आसमान छूते पहाडों के साथ नीचे छूट गये घर, दुकानें, रेस्तररां भी देख सकती हूँ जो खिलौनों जैसे लग रहे हैं। सड़कों के किनारे जगह जगह नाॅनवेज, मैगी, चाय और भुट्टों की रेहड़ियां हैं। सबसे तेज गंध नाॅनवेज की आ रही है। मुझ जैसे प्योर वेजिटेरियन्स को छोड़कर कोई भी उसे खाने को मचल सकता है।

ये अधिकांश रेहड़ी वाले नेपाली हैं। 9 डिग्री सेल्सियस तापमान पर भी वे सारे बिना ठिठुरे अपने काम में लगे हुए हैं। लेकिन हम सब सर्दी से कांप रहे हैं। इतनी सर्दी तो हमने पिछले दो-तीन सालों से दिसंबर में भी नहीं देखी।

फिलहाल सबको भूख और ठंड से मचलता देख बस चाय नाश्ते के लिए रोकी गयी है। चाय वाले से ज्यादा भीड़ भुट्टे वाले के पास उमड़ी है। एक साथ इतनी भीड़ देख सोलह सत्रह साल का वो लंबे चोगे वाला लड़का खुश लग रहा है। उसने भुट्टे छीलना शुरू किया। एक-एक करके खूब सारे भुट्टे छीलकर एक तरफ रख दिए और फिर एक साथ तीन भुट्टे उंगलियों में फंसा कर सेंकने के लिए सिगड़ी के ऊपर कर दिए।

चारों तरफ से धुंध में लिपटे पहाड़ और उन पहाड़ों में घुलती भुट्टे के सिकने की खुशबू अचानक ही भूख बढ़ाती जा रही है। ठंड से सिकुड़ी हम सब की नाक जैसे खुशबू पाकर फैल रही है, मुंह पानी से भरता जा रहा है, सबसे कठोर इंतजार के पल है; गरमा गरम भुट्टे के मुंह तक आ जाने का इंतजार।

लगभग तीन मिनट बाद भुट्टे सेंकें जा चुके हैं। लड़का उन पर एक एक करके नींबू रगड़ता है, सेंधा नमक छिड़कता है और ये भुट्टा मेरे हाथ में है। मैं भुट्टे की गरमाहट से हाथ सेंकने की कोशिश करते हुए जल्दी से उसे खाना शुरु करती हूँ।


'आह! कितना स्वादिष्ट है यह', मैं कहती हूँ और मन पहाड़ियों के मनमोहक स्वाद में झूम उठता है।

खा पीकर हम वापिस बस में बैठ चुके हैं। बस आगे बढ़ रही है। जगह जगह पत्थर तराशते  झरने दिल लूटते जा रहे हैं। मसूरी शहर जो पहाड़ों को छुपा लेने पर बाकी शहरों जैसा ही है, उसे चीरते हुए केंपटी फॉल की तरफ बढ़ते हैं।

13 किलोमीटर चलने के बाद हम केंपटी फॉल पहुंच चुके हैं। व्यूप्वाइंट अभी दूर है, लेकिन आगे पैदल चलना होगा। मैं अपने दोस्तों से जानबूझकर पीछे छूट चुकी हूं ताकि इस मौसम को बिना कुछ कहे-सुने बस अपने अंदर समेटती हुई चल सकूँ।

मैं सड़क के एक तरफ खड़ी पहाड़ी दीवार पर जमी काई को छूती हूँ। काई इतनी है कि अब घास की तरह हथेली गुदगुदाती है। सड़क के दूसरी तरफ दुकानें हैं, घर हैं, बालकनी सजाती औरतें है, बगीचे संवारते आदमी हैं।

'पेड़ लगाओ' का कोई बैनर कहीं भी नहीं लगा। हर तरफ पेड़ ही पेड़ हैं, असीम हरियाली ही हरियाली है और इसी बीच है मुग्ध होता मेरा मन।

मुझे हल्के गुलाबी फूलों वाला एक पेड़ दिखता है, जिसका नाम मैं नहीं जानती। ये कुछ-कुछ Prunus serrulata जैसा है। इसे देख मुझे अचानक ही कैक्टस याद आता है; थार का गुलाब- कैक्टस।

कैसे इस गुलाबी फूलों वाले पेड़ के वजूद से अनजान हमेशा कांटों से भरा खड़ा रहता है; बिना पानी, बिना किसी देखभाल के।

मुझे अपनी माँ, उनकी माँ और फिर बारी बारी से हर उस माँ की याद आती है जो राजस्थान पार करके इन रंगीन फूलों वाले पेड़ों से लदी पहाड़ियों तक कभी नहीं पहुंच सकी और शायद न ही पहुंच पाएंगी।

'मैं कितनी खुशनसीब हूं' सोच कर मैं मुस्कुराती हूं।

सामने से एक सफेद बालों वाली विदेशी युवती मुझे दिखती है। वह शरीर से जवान है मगर बालों से बूढ़ी दिखती है। मुझे मुस्कुराता देख वो भी मुस्कुराती है और मेरे पास से गुजरते हुए अपने अंग्रेजी लहजे में 'नमस्ते' बोलती है। मेरे जवाब देने से पहले वह आगे निकल चुकी है। मैं पलट कर देखती हूं, मगर वह नहीं देखती। शायद उसकी इसी आदत में पश्चिमी देशों के अधिक विकसित होने का रहस्य छुपा है।

मसूरी की गलियों को चीरते हुए मैं कैेंपटी फॉल के ठीक सामने पहुंच चुकी हूं। यह बहुत सुंदर है। लेकिन चारों तरफ से दुकानों से घिरा होना मेरे लिए इसकी खूबसूरती को घटा रहा है। मैं ये दुकानें नहीं देखना चाहती। सिर्फ झरना देखना चाहती हूं; पहाड़ों से नीचे गिरता झरना।

ओह! इसे आंखें बंद करके देखा जा सकता है। मानव के स्पर्श से बची प्रकृति जैसा; जो आजकल खुली आंखों को नहीं मिलती।

कितना सुंदर है यह! किसी बच्चे के मन जितना निर्मल और साफ भी।

एकदम ऊपर जहां से पानी गिरना शुरू होता है, वहाँ एक तिरछा खड़ा पेड़ है। पेड़ पर कुछ कौवे बैठते हैं और बार बार झरने की आवाज से डरकर उड़ जाते हैं।

इतने सुंदर झरने को देखते हुए इस पल मैं भी उड़ना चाहती हूं। कौवे जो एक घंटे में सत्तर मील तय कर सकते हैं, उनसे भी तेज। अरे वाह! मैं उड़ रही हूं, झरने के आसपास, बंद आंखों से अपने मन में दिखती उसकी साफ-सुथरी और मनमोहक छवि के आसपास।

हमारे हिस्से की हर खूबसूरती अपनी मियाद साथ लेकर आती है और मेरी आंखें उस मियाद के आखिरी बिंदु पर खड़ी है। मुझे चलना होगा; कैेंपटी फॉल को यूं ही बहता छोड़कर, कौवों को उड़ता छोड़ कर और इन दुकानों को झरने की खूबसूरती घटाता छोड़कर।

और एक बार फिर से हम बस में है। मसूरी में  विशेष बिंदु ज्यादा नहीं है जिन्हें देखा जाए। लेकिन यहां के हर बिंदु पर मौसम और नजारे ऐसे हैं कि आप खुद को दीवाना होने से नहीं बचा सकते। अाप बचाना चाहेंगे भी नहीं। बल्कि आप तो बस आंखें मूंदकर इस मौसम को बाहों में भर लेना चाहेंगे, यहां की हरियाली को चूम लेना चाहेंगे, हवाओं को छू लेना चाहेंगे। बस पागल सा हो जाना चाहेंगे कायनात की अदाओं पर; ठीक वैसे ही जैसे कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका पर होता है।

आगे देखने को कोई नियत बिंदु नहीं है। लेकिन हम फिर भी बढ़ रहे हैं। किसी ऐसे बिंदु पर पहुंचने के लिए जहां से इस पूरी ऊंचाई से खुले आसमान और गहरी धरती दोनों को देख लिया जाए।

कुछ दूर बस और फिर कुछ दूर पैदल थोड़ा ऊपर चढ़ने के बाद आखिरकार हम पर्वतमाला के सबसे ऊपरी छोर पर हैं। वहां भी मैं एक पत्थर पर चढ़कर खड़ी हूँ। इतना ऊपर आकर लगता है कि एक सीढ़ी भर की दूरी पर खड़ा आसमान मेरे अंदर खिलखिलाते रेगिस्तान को देख कर मुस्कुरा रहा है। मैं बहुत खुश हूं क्योंकि मैं बादलों के बीच हूं। खिड़की पर बादल सजाने का ख्वाब देखने वाली लड़की बादलों के बीच है, बादलों को छू सकती है, बादलों पर नाच सकती है।

मुझे गाना नहीं आता, लेकिन मैं गाना चाहती हूँ; बहुत जोर जोर से और फिर अपने ही गान पर झूमना चाहती हूं। इस ऊंचाई पर आकर अपने मन के उस शिखर को भी छू लेना चाहती हूँ, जो किसी का भी मन छू सकता है।

अब और क्या कहूं। इतनी खूबसूरती है यहाँ! कहीं मैं मर ना जाऊं इस कायल करते पल में।
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बस अब चलना होगा। सफर और शिखर दोनों ही शानदार रहे। मैं लौट रही हूँ । लेकिन लौटने में थोड़ी उदासी और थोड़ा चाव दोनों है। उदासी इस पहाड़ों की रानी को अनिश्चित समय के लिए अलविदा कहने की और चाव अपने रेगिस्तान में लौटकर उसे यहां के बारे में ढेर सारी बातें बताने का।

चलते चलते बस काफी नीचे उतर आई है। यह पहाड़ों से समतल की तरफ लाता आखिरी मोड़ है। मैं  पीछे मुड़ कर  देखती हूँ। मोड़ पर ऊपर चढ़ने वालों के लिए बोर्ड लगा है-

'Feel the curves, but don't hug them'

मैं पढ़ती हूँ और दोहराती रहती हूँ । ऐसे जैसे ये सिर्फ इन पहाड़ों का ही नहीं, जीवन के तमाम पेचीदा रास्तों का फलसफा हो।

© Deeksha Choudhary

दीक्षा चौधरी (19 वर्ष)
श्रीगंगानगर, राजस्थान

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सच और झूठ,
मैं दोनों बोलता हूं,
मुझे दोनों ही चाहिए।

दोनों ही पूरक है एक-दूजे के,
जैसे चीर देता है प्रकाश ,अंधेरे को 
पर सोते वक्त चाहिए होता है अंधकार तुम्हें,
जैसे हर वक्त अंधकार बुरा नहीं होता ,
बस वैसे हर वक़्त प्रकाश ठीक नही होता,
काल्पनिक होना, न होने के बराबर मान लेते हैं लोग,
ये गलत है,

क्योकि कल्पना, वास्तविकता का ही तो पूरक है,
जैसे सोचोगे नही, तो करोगे कैसे?
करोगे नही, तो होगा कैसे?
हुआ नही तो वास्तविकता भी नही।
अतः कल्पना ही आधार है वास्तविकता का।

प्रेम ही आधार है जीवन का।
जैसे काल्पनिक है मेरा प्रेम,
और वास्तविक हो , बस तुम।



-गुंजन गोस्वामी
 सिंहेश्वर, मधेपुरा 
हँस-हँस कर रोज सपनों में आती 
रुला कर मुझको न जाने कहाँ चली जाती..
जब भी आतीबातें बनाती.
न जाने वो कौन थी ?

जब भी आतीरुला कर जाती|
बड़े भावुक होकर खड़ी-खोटी सुनाती.

कोई तो समझाओ इस निर्दयी समाज को.
बेटे की हठ लगाये.
दिन-दहाड़े करते कन्या हत्या.
कोई तो बताओकोई तो समझाओ.

आज की कन्या नहीं किसी से पीछे.
हथियार थामे करती सरहद पर रक्षा.

पी.टी. उषासानिया मिर्ज़ा या हो साइना नेहवाल.
सभी ने बढ़ाया भारत का सम्मान.
प्रतिभा पाटिल ने भी थामी थीभारत की कमान,
इसके आगे और क्या कहना ?

हर घर में पैदा होऊँगी.
कहलाऊँगी जगत जननी.
मै माँ हूँबेटी हूँबहन हूँ,
फिर भी शर्म नहीं आती, करते हो कन्या हत्या,

हँस-हँस कर रोज सपनों में आती थी,
रुला कर मुझको न जाने कहाँ चली जाती थी,
जब भी आतीरुला कर जाती|


दीपक यादव
मधेपुरा,बिहार
मो-7549494954
जो कहा सब सुना जो किया सब सहा
यूँ कोई आदमी आदमी ना रहा

कर रहा था कोई ज़िन्दगी को बयाँ
हो गया वाकया जो कहा अनकहा

इक मुसाफ़िर खुशी ढूँढता था जहाँ
तानकर गम की चादर वहीं सो गया

तू सलामत रहे बस यही इल्तिजा
दे दुआ तू मुझे या कि दे बददुआ

कर रिहा, दे सज़ा, है तेरा मामला
दे रहा है गवाही मेरी खुद खुदा

अमन
सिंघेश्वर, मधेपुरा
(बिहार)
दिल्ली रेलवे स्टेशन से ट्रेन के पहिये खिसकने लगे थे. अब बस मुझे याद आ रही थी तो साहिल की. उसके साथ बिताये हर लम्हें को मैंने इन सालों में अपने अन्दर कुछ इस तरह सहेज रखा था, जैसे रात अपने पेशानी पर सुबह को. आज से ठीक चार साल पहले लखनऊ शहर ने हमें मिलाया था. तब हम दोनों एक दूसरे के लिए बिल्कुल अजनबी थे. और आज दोनों एक दूसरे की जिंदगी बन गये हैं.

होस्टल की लम्बी दीवारें और कायदे कानून मुझे हमेशा डराते थे. लेकिन मेरा डॉक्टर बनने और साहिल को पाने का सपना उन बंदिशों से कहीं ऊँचा था. दिल्ली आने से पहले मैं अपने परिवार के साथ लखनऊ में रहती थी. पिताजी सरकारी नौकरी में थे और माँ एक सीधी साधी घरेलू महिला. मै भाई बहनों में अकेली थी, इसीलिए शायद लाड़-प्यार ने मुझे जिद्दी बना दिया था. और मेरा डॉक्टर बनना उसी जिद्द का एक हिस्सा था. बस मैंने ठान लिया था कि डॉक्टर  बनना है तो बनना है. बेचारे पिताजी ने पाई पाई करके जो पैसे मेरी शादी के लिए जोड़े थे. उसे मेरे मेडिकल कॉलेज में दाखिले करवाने में झोंक दिया था. शायद उनको भी मेरी ही तरह मुझ पर और मेरे फैसले पर यकीन था.

मेरे डाक्टर बनने की एक वजह ये भी थी, मैंने अपनी जिंदगी में ऐसे कई लोग देखे जिनके पास पैसे न होने की वजह से सही समय पर सही इलाज न हो पाया और उन्हें अपनी जिंदगी से हांथ तक धोना पड़ा. पैसे की कमी ने छोटी छोटी बीमारियों से ही गरीब माँ के कोख उजाड़ दिए और वो यह सब देख कुदरत की पथरीली जमीं पर धस सी जाती थी, जहाँ ऐसे डॉक्टर थे, जो चंद रुपयों में जिंदगी का सौदा कर रहे थे “,हार जीत के इस बाजार में खाली हांथो का हारना तय होता थायह सब देख मै अन्दर तक कांप  गई थी. बस मैंने सोच लिया डॉक्टर बनकर गरीबों के लिए कुछ करना है, और औरों को भी इसके लिए जागृत करना है.

साहिल जिससे मैं बहुत प्यार करती हूँ. उससे पहली बार मैं लखनऊ के एक अस्पताल में मिली. उस दिन मैंने देखा था एक ऐसा शख्स को, जो खुद व्हील चेयर पर होते हुए भी मरीज़ों की तामिरदारी कर रहा था. जिसकी उम्र यही कोई पच्चीस साल और लम्बा गठीला सांवला सा चेहरा. अस्पताल के उस जनरल वार्ड में निस्वार्थ भाव से वो कभी किसी अम्मा को अपने हाथों से मुँह में कौर दे रहा था तो कभी किसी की ज़ख्मों को अपने हाथो से साफ़ कर रहा था और कभी किसी बूढ़े बाबा का पैर दबा रहा था. दुःख के घड़ी में जब कोई ऐसे आपके साथ खड़ा हो, वो भी निस्वार्थ फिर तो वो शख्स आपकी जिंदगी का एक अहम हिस्सा बन जाता है. 

उसे यूँ सहज और सरल मददगार देख मुझे उसके बारे में जानने की उत्सुकता बढ़ गई थी. मैंने पास खड़े नर्स से उसके बारे में पूछा तो उसने कहा मैडम यह साहिल है, हाल ही में एक रोड एक्सीडेंट में इसके दोनों पैर काम करना बंद कर दिए हैं मगर इसके व्हीलपावर को देख यहाँ के डॉक्टर अभी भी थोड़ी उम्मीद है कि ये फिर से सामान्य हो जायेगा.

उस नर्स की बातें सुनकर मारे अफ़सोस के जुबान से बस इतना ही निकाल पाया था. ओह ... गॉड
साहिल हर दिन मरीज़ों से मिलता था फिर एक दिन उसके हिम्मत और हौसले को सलाम करती हुई हूँ मैंने अपना हाथ उसकी ओर बढ़ा दिया था. आई एम् सोनिया उसने भी अपना हाथ आगे बढ़ा कर कहा जी मैं साहिल, पर माफ कीजियेगा मैंने आपको पहचाना नहीं. क्या आप कोई नई डाक्टर हैं? मैं हंस पड़ी थी नहीं अभी तो नहीं, माँ घुटनों के दर्द से बहुत परेशान रहती है इसलिए उनके साथ डॉक्टर के चक्कर काट रही हूँ. खैर, क्या हम कल कॉफ़ी साथ पी सकते हैं?

जी पर.. दबे आवाज़ में साहिल ने कहा तो मैंने उसे रोकते हुए कल शाम पाँच बजे मैं पास के कॉफ़ी डे में आपका इंतजार करुँगी और मैं इतना कहकर वहाँ से चली आई.

अगले दिन घड़ी की सूईयों पर नज़र टिकाए मैं पाँच बजने का इंतजार कर रही थी. कल जल्दबाजी में मैं साहिल से मोबाईल नम्बर भी लेना भूल गई थी. शाम में तय वक़्त पर कॉफ़ी डे पहुँच कर मैंने देखा, साहिल अपनी व्हील चेयर के साथ पहले से वहाँ मौजूद है. वक़्त का जितना पाबंद था उतना ही दिल से आत्मीय. मेरे बैठते ही पानी का ग्लास बढ़ाते हुए उसने कहा क्यों मिलना चाहती थी आप मुझसे?”

कुछ चीजें जिंदगी में बेवजह हो तो लोगों को उसमें एतराज नहीं जताना चाहिए मैंने कह तो दिया था मगर सच तो ये था कि मैं उसके जज्बे को देखकर उसकी कायल हो गई थी. इससे पहले कि वो और कुछ सवाल करता मैंने ही झट से कह दिया. क्या आप मेरे दोस्त बनना चाहोगे?

हाँ, क्यों नहीं ? पर मेरे ख्याल से आपको एक बार फिर से सोचना चाहिए सानिया जी, साहिल ने कहा. 
उसके जवाब को सुनकर मैं हैरत में थी. क्या मैं वही सानिया हूँ? जिसके पीछे लड़कों की लाइन लगी रहती है. मैं आसानी से किसी को भाव न देने वाली लड़कियों में से नहीं थी पर न जाने, कैसे? आज मैं साहिल पर आकर ठहर गई थी.

फिर मैंने साहिल की आँखों में आँखे डालकर मुस्कुराते हुए कहा, सानियाअपने फैसले करना बखूबी जानती है.

मेरी और साहिल की दोस्ती उस शाम के बाद, घंटों की मुलाकातों में तब्दील होने लगी थी. हम घंटो एक दूसरे के साथ काफ़ी बिताने लगे थे. अस्पताल में मरीजों की तामिरदारी में मैं भी साहिल की मदद करती. गुजरते वक़्त के साथ मैं और साहिल अब एक दूसरे को जीवनसाथी के रूप में देखने लगे थे. हालांकि उसने मुझसे ऐसा कभी कुछ नहीं कहा मगर उसकी चुप्पी मुझसे बहुत कुछ कह जाती थी. 

मुझे बस अब चिंता थी तो अपने पिताजी और माँ की. जो अपनी बेटी को एक ऐसे लड़के के साथ कतई नहीं ब्याह सकते थे, जो अपने पैरों पर चल भी न सकता हो. ये और बात थी कि मेरे हिसाब से उसमे ऐसी कोई कमीं न थी. जो कुछ हम एक जीवनसाथी से उम्मीद करते हैं. पर खुशी की बात ये थी मै अपने माँ पापा को मनाने में कामयाब हो गई.

मेरा दिल्ली के मेडिकल कालेज में दाखिला हो गया था, पर साहिल को छोड़ जाने का बिलकुल मन नहीं कर रहा था. अपने मन का बोझ हल्का करते हुए साहिल से मैंने अपने प्यार का इजहार किया तो उसने अपने आंसू छुपाते हुए मुस्कुरा कर कहा मेरे साथ जिंदगी आसान न होगी. मैने उसका हाथ थामते हुए कहा तुम साथ दो तो मुश्किल भी न होगी. साहिल ने मुझे गले से लगाते हुए कहा, 'आई लव यू टू'. फिर मैंने दिल्ली की ओर रुख किया.

वक़्त के फिसलते पहिये के तले आख़िरकार आज चार साल बाद मैं अपनी डॉक्टरी के सपने को साकार कर वापस अपने शहर और साहिल के बीच जा रही हूँ....


जूली अग्रवाल 
कोलकाता