दिल्ली रेलवे स्टेशन से ट्रेन के पहिये खिसकने लगे थे. अब बस मुझे याद आ रही थी तो साहिल की. उसके साथ बिताये हर लम्हें को मैंने इन सालों में अपने अन्दर कुछ इस तरह सहेज रखा था, जैसे रात अपने पेशानी पर सुबह को. आज से ठीक चार साल पहले लखनऊ शहर ने हमें मिलाया था. तब हम दोनों एक दूसरे के लिए बिल्कुल अजनबी थे. और आज दोनों एक दूसरे की जिंदगी बन गये हैं.

होस्टल की लम्बी दीवारें और कायदे कानून मुझे हमेशा डराते थे. लेकिन मेरा डॉक्टर बनने और साहिल को पाने का सपना उन बंदिशों से कहीं ऊँचा था. दिल्ली आने से पहले मैं अपने परिवार के साथ लखनऊ में रहती थी. पिताजी सरकारी नौकरी में थे और माँ एक सीधी साधी घरेलू महिला. मै भाई बहनों में अकेली थी, इसीलिए शायद लाड़-प्यार ने मुझे जिद्दी बना दिया था. और मेरा डॉक्टर बनना उसी जिद्द का एक हिस्सा था. बस मैंने ठान लिया था कि डॉक्टर  बनना है तो बनना है. बेचारे पिताजी ने पाई पाई करके जो पैसे मेरी शादी के लिए जोड़े थे. उसे मेरे मेडिकल कॉलेज में दाखिले करवाने में झोंक दिया था. शायद उनको भी मेरी ही तरह मुझ पर और मेरे फैसले पर यकीन था.

मेरे डाक्टर बनने की एक वजह ये भी थी, मैंने अपनी जिंदगी में ऐसे कई लोग देखे जिनके पास पैसे न होने की वजह से सही समय पर सही इलाज न हो पाया और उन्हें अपनी जिंदगी से हांथ तक धोना पड़ा. पैसे की कमी ने छोटी छोटी बीमारियों से ही गरीब माँ के कोख उजाड़ दिए और वो यह सब देख कुदरत की पथरीली जमीं पर धस सी जाती थी, जहाँ ऐसे डॉक्टर थे, जो चंद रुपयों में जिंदगी का सौदा कर रहे थे “,हार जीत के इस बाजार में खाली हांथो का हारना तय होता थायह सब देख मै अन्दर तक कांप  गई थी. बस मैंने सोच लिया डॉक्टर बनकर गरीबों के लिए कुछ करना है, और औरों को भी इसके लिए जागृत करना है.

साहिल जिससे मैं बहुत प्यार करती हूँ. उससे पहली बार मैं लखनऊ के एक अस्पताल में मिली. उस दिन मैंने देखा था एक ऐसा शख्स को, जो खुद व्हील चेयर पर होते हुए भी मरीज़ों की तामिरदारी कर रहा था. जिसकी उम्र यही कोई पच्चीस साल और लम्बा गठीला सांवला सा चेहरा. अस्पताल के उस जनरल वार्ड में निस्वार्थ भाव से वो कभी किसी अम्मा को अपने हाथों से मुँह में कौर दे रहा था तो कभी किसी की ज़ख्मों को अपने हाथो से साफ़ कर रहा था और कभी किसी बूढ़े बाबा का पैर दबा रहा था. दुःख के घड़ी में जब कोई ऐसे आपके साथ खड़ा हो, वो भी निस्वार्थ फिर तो वो शख्स आपकी जिंदगी का एक अहम हिस्सा बन जाता है. 

उसे यूँ सहज और सरल मददगार देख मुझे उसके बारे में जानने की उत्सुकता बढ़ गई थी. मैंने पास खड़े नर्स से उसके बारे में पूछा तो उसने कहा मैडम यह साहिल है, हाल ही में एक रोड एक्सीडेंट में इसके दोनों पैर काम करना बंद कर दिए हैं मगर इसके व्हीलपावर को देख यहाँ के डॉक्टर अभी भी थोड़ी उम्मीद है कि ये फिर से सामान्य हो जायेगा.

उस नर्स की बातें सुनकर मारे अफ़सोस के जुबान से बस इतना ही निकाल पाया था. ओह ... गॉड
साहिल हर दिन मरीज़ों से मिलता था फिर एक दिन उसके हिम्मत और हौसले को सलाम करती हुई हूँ मैंने अपना हाथ उसकी ओर बढ़ा दिया था. आई एम् सोनिया उसने भी अपना हाथ आगे बढ़ा कर कहा जी मैं साहिल, पर माफ कीजियेगा मैंने आपको पहचाना नहीं. क्या आप कोई नई डाक्टर हैं? मैं हंस पड़ी थी नहीं अभी तो नहीं, माँ घुटनों के दर्द से बहुत परेशान रहती है इसलिए उनके साथ डॉक्टर के चक्कर काट रही हूँ. खैर, क्या हम कल कॉफ़ी साथ पी सकते हैं?

जी पर.. दबे आवाज़ में साहिल ने कहा तो मैंने उसे रोकते हुए कल शाम पाँच बजे मैं पास के कॉफ़ी डे में आपका इंतजार करुँगी और मैं इतना कहकर वहाँ से चली आई.

अगले दिन घड़ी की सूईयों पर नज़र टिकाए मैं पाँच बजने का इंतजार कर रही थी. कल जल्दबाजी में मैं साहिल से मोबाईल नम्बर भी लेना भूल गई थी. शाम में तय वक़्त पर कॉफ़ी डे पहुँच कर मैंने देखा, साहिल अपनी व्हील चेयर के साथ पहले से वहाँ मौजूद है. वक़्त का जितना पाबंद था उतना ही दिल से आत्मीय. मेरे बैठते ही पानी का ग्लास बढ़ाते हुए उसने कहा क्यों मिलना चाहती थी आप मुझसे?”

कुछ चीजें जिंदगी में बेवजह हो तो लोगों को उसमें एतराज नहीं जताना चाहिए मैंने कह तो दिया था मगर सच तो ये था कि मैं उसके जज्बे को देखकर उसकी कायल हो गई थी. इससे पहले कि वो और कुछ सवाल करता मैंने ही झट से कह दिया. क्या आप मेरे दोस्त बनना चाहोगे?

हाँ, क्यों नहीं ? पर मेरे ख्याल से आपको एक बार फिर से सोचना चाहिए सानिया जी, साहिल ने कहा. 
उसके जवाब को सुनकर मैं हैरत में थी. क्या मैं वही सानिया हूँ? जिसके पीछे लड़कों की लाइन लगी रहती है. मैं आसानी से किसी को भाव न देने वाली लड़कियों में से नहीं थी पर न जाने, कैसे? आज मैं साहिल पर आकर ठहर गई थी.

फिर मैंने साहिल की आँखों में आँखे डालकर मुस्कुराते हुए कहा, सानियाअपने फैसले करना बखूबी जानती है.

मेरी और साहिल की दोस्ती उस शाम के बाद, घंटों की मुलाकातों में तब्दील होने लगी थी. हम घंटो एक दूसरे के साथ काफ़ी बिताने लगे थे. अस्पताल में मरीजों की तामिरदारी में मैं भी साहिल की मदद करती. गुजरते वक़्त के साथ मैं और साहिल अब एक दूसरे को जीवनसाथी के रूप में देखने लगे थे. हालांकि उसने मुझसे ऐसा कभी कुछ नहीं कहा मगर उसकी चुप्पी मुझसे बहुत कुछ कह जाती थी. 

मुझे बस अब चिंता थी तो अपने पिताजी और माँ की. जो अपनी बेटी को एक ऐसे लड़के के साथ कतई नहीं ब्याह सकते थे, जो अपने पैरों पर चल भी न सकता हो. ये और बात थी कि मेरे हिसाब से उसमे ऐसी कोई कमीं न थी. जो कुछ हम एक जीवनसाथी से उम्मीद करते हैं. पर खुशी की बात ये थी मै अपने माँ पापा को मनाने में कामयाब हो गई.

मेरा दिल्ली के मेडिकल कालेज में दाखिला हो गया था, पर साहिल को छोड़ जाने का बिलकुल मन नहीं कर रहा था. अपने मन का बोझ हल्का करते हुए साहिल से मैंने अपने प्यार का इजहार किया तो उसने अपने आंसू छुपाते हुए मुस्कुरा कर कहा मेरे साथ जिंदगी आसान न होगी. मैने उसका हाथ थामते हुए कहा तुम साथ दो तो मुश्किल भी न होगी. साहिल ने मुझे गले से लगाते हुए कहा, 'आई लव यू टू'. फिर मैंने दिल्ली की ओर रुख किया.

वक़्त के फिसलते पहिये के तले आख़िरकार आज चार साल बाद मैं अपनी डॉक्टरी के सपने को साकार कर वापस अपने शहर और साहिल के बीच जा रही हूँ....


जूली अग्रवाल 
कोलकाता 
दया आती है मुझे तुम पर,
तुम्हारी सोच पर,
तुम्हारे धर्म पर,
ऐसे रीति रिवाज़ों पर।
दया आती है मुझे
तुम्हारे दिखावेपन पर,
ओछे आदर्शों पर,
झूठे शान पर।
अपने स्वार्थ के लिए
स्त्री का सम्मान
क्यो करते हो दिखावे के लिए
स्त्री का सम्मान?

तुम्हे कोई हक़ नही
 मेरी खुशी मे शामिल होने का
क्योंकि मेरे दर्द मे तुम भागीदार नहीं।
तुम्हे कोई हक़ नहीं मुझे छूने का
क्योंकि मेरी मुश्किल घड़ी को 'उन दिनों'
कहने का तुम्हे कोई अधिकार नहीं।
क्यो शर्माएं हम इसके होने से
 ये हमारा कसूर नहीं।
कुदरत ने बनाया है ये नियम,
इसे गंदगी बोल,
तुम भी बेकसूर  नहीं।
क्यों बीमार कहते हो हमें,
जब तुम खुद मानसिक बीमार हो।
क्यों रोकते हो हमें पूजा करने से,
रसोई मे जाने से य कुछ भी करने से,
बस तुम्ही इसके कसूरवार हो।

सिर्फ टीवी पर सोच बदलने से कुछ न होगा,
अपने अंदर की गंदगी साफ करो।
क्यों छिपाकर खरीदती हूँ मैं सामान अपने
कभी सोचा है तुमने,
मुझे शर्म नहीं बस भय है तुम्हारी हैवानियत का
ज़रा कुछ तो खुद मे बदलाव करो।
तुम्हारा नज़रिया, तुम्हारी टिप्पणियाँ,
मुझे झझकोरते नहीं,
ये तो तुम्हारे संस्कार हैं।

मैं तो आज़ाद पंछी हूँ, उडूंगी,
उड़ती रहूंगी, यही मेरी पहचान है।
एक वीर ने कहा था- "तुम मुझे खून दो
मैं तुम्हे आज़ादी दूंगा"|
मैंने तो 12 साल की उम्र से खून दिया है,
पर फिर भी क्यों मैं आज़ाद नहीं।
तक़लीफ़ हमें होती है,
नियम तुम क्यों बनाओगे।
सहन हमे करना है तो
अंदाज़ा तुम क्यों लगाओगे।
हमे ज़रूरत नहीं तुम्हारे अहसानों की,
अपना मुकाम हम खुद पाएंगे।
बस रुकावट मत बनो हमारे रास्ते की
अपनी राह हम खुद बनाएंगे।
अपनी राह हम खुद बनाएंगे।

 

 गुंजन गोस्वामी
 सिंहेश्वर, मधेपुरा
उम्र-भर ज़िन्दगी कश्मकश में रही
क्या गलत क्या सही क्या करूँ क्या नहीं

बेरुखी बेबसी बेदिली बेकली
मैं गया हूँ बदल या बदल तुम गयी

मुद्दतों बाद तुमने जो कल बात की
बर्फ-सी उलझनें सब पिघल-सी गयी

रात दिन धूप बरखा जमीं आसमाँ
सब वही है मगर है नहीं सब वही

है किसी के लिए ज़िन्दगी मौत-सी
और किसी के लिए मौत भी ज़िन्दगी


अमन
सिंघेश्वर, मधेपुरा (बिहार)
9473517706
Segment-1

मैं कैसे भूल सकता हूँ? रौशनी से सराबोर उस चाँदनी रात को. जब आसमान पहले पहर के सितारों की मौजूदगी में मुस्कुरा रहा था और नीचे छत पर खड़ी वो. उसकी नज़र असंख्य तारों के बीच एक सबसे चमकीले तारों पर ठहरी थी और अपने कमरे की खिड़की से झांकती मेरी नज़र उस पर.

दुधिया चाँदनी रौशनी में उसका रंग और खूबसूरती मुझे अपने कल्पनाओं से परे पहुँचा रही थी. खिड़की पे खड़ा अभी मैं उसकी खूबसुरती को निहार ही रहा था कि उसकी नज़र मुझ से टकरा गई. मैं थोड़ा सकपकाया जैसे किसी चोर की चोरी पकड़ी गई हो, लेकिन उसने बिना किसी आपत्ति के मुस्कराहट का नजराना दिया और चुपचाप चली गई. उसके जाने के बाद, मैं भी खिड़की से हट गया था. बिस्तर पर सोने की नाकाम कोशिश किया पर कामयाब नहीं हुआ कमबख्त नींद को तो जैसे वो अपने साथ ले गई थी. पूरी रात उसकी खूबसूरती को आँखों में समेटने और उससे फिर मिलने की दुआओं में गुजरी.

सुबह में मंदिर के घंटो की ध्वनि, शंख का शोर, गँगा आरती की आवाज़ ने एक बार फिर मुझे बनारस में ही होने का एहसास कराया था. रुनझुन करते झूमते बैल और अलख जगाते धुनी रमाते साधुओं की टोली गलियों से निकल पड़ी थी. खिड़की से छनकर आती खिलखिलाती धूप ने मुस्कुरा कर ये कहकर मेरा स्वागत किया था कि लो सूरज तुम्हारा बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में पढ़ने का बरसों का सपना पूरा हो गया है. आख़िरकार तुम्हें यूनिवर्सिटी में दाखिला मिल ही गया. उठो अब कॉलेज चलने की तैयारी करो.

रात की उन लम्हों से इतर मैं फटाफट तैयार होकर कॉलेज के लिए निकल गया. पहले दिन के इंट्रो वाली हल्की-फुल्की क्लासेस के बाद मैं कमरे में लेटा ही था, कि तभी दरवाजे की घंटी बजी. खोला तो सामने पंडित जी जैसा हुलिया लिये कोई चालीस पैंतालीस साल का रौबीला शख्स खडा था.
मैंने उन्हें देखते ही नमस्ते किया तो वो ठीक है, ठीक है कह कड़क लहजे में आगे बोल पड़े तुम यहाँ नये आये हो? इसीलिये तुम्हे बताने आया हूँ यहाँ शराब, सिगरेट, नानवेज सब मना है, देर रात तक तेज आवाज़ जो किसी के लिये परेशानी बने वो नही हो तो बेहतर है. और हाँ, जब भी तुम्हे किसी सहायता की जरुरत लगे बेहिचक मेंरे पास आ जाना. मैं इस कैंपस का सेक्रेटरी हूँ और सामने के तीन तल्ले पे रहता हूँ.
जी जरुर के साथ जब मैंने आश्वासन भरी मुस्कराहट दी तो वो गये. ये पहली दफा हुआ था मेरे साथ कि किसी के जाते ही तुरन्त फिर उनसे मिलने के बहाने ढूँढने में लग गया था. दरअसल उन्होंने जिस तीन तल्ले मकान की ओर इशारा कर के अपना पता बताया था. उसी मकान के छत पर मैंने कल उस लड़की को देखा था. जिसकी खूबसूरती ने कल रात मेरा चैन चुरा लिया था. 

Segment-2
वक़्त ने आखिरकार मौका दे दिया था. पंडित जी के पास जाने का मुझे बहाना मिल गया था. अगले दिन पंडित जी वाली बिल्डिंग की संकीरी सीढ़ियाँ नापते दिल बस यही दुआ कर रहा था कैसे भी वो लड़की फिर दिख जाय?

उम्मीद की हाथ थामे मैं अपने मुकाम पर पहुँच कर पंडित जी के घर का डोर बेल बजाया. और जब दरवाजा खुला तो मैं जड़ हो गया था. जिसको देखने को नज़रें कब से बेताब थी. जिसे दिल ढूंढ ढूंढ कर खुद कहीं खो गया था. वो मेरे सामने थी. वो तो शुक्र हो पंडित जी का जिनकी कड़क आवाज़ ने मुझे वापस उसी अवस्था में ले आया था. कौन है वहाँ संध्या? पंडित जी के पीछे-पीछे संध्या ने भी मुझसे पूछ लिया जी आप कौन”?
मैं यूँ जैसे उसे आशिक कहते-कहते बचा था. लड़खड़ाई हुई आवज़ में जी, जी, मैं सूरज, पंडित अंकल से मिलना था. कुछ मदद चाहिये थी.  आपके सामने के मकान में नया आया हूँ”. संध्या के साथ पंडित जी तक मेरी आवाज़ पहुँच चुकी थी. पंडित जी दरवाजे पर आये और मुझे इशारे से अंदर आने को कहा.

अंदर मौजूद धूप और अगरबत्ती की खुशबू ने मुझे किसी मंदिर में खड़े होने का एहसास करवाया था. सच कहूँ तो पंडित जी का घर नहीं छोटा सा शिवालय था. घर के एक कोने में छोटा सा मंदिर बना था और कई देवी देवताओं के बीच शिव जी विराजमान थे. बोलो सूरज क्या मदद चाहिए?” पंडित जी ने पूछा तो मैंने कहा “जी मेंरे नल में पानी नहीं आ रहा”.
अच्छा, ये बात है. ठीक है तुम चलो, मैं मिश्रा जी को भेजता हूँ. वो तुम्हारी पानी की समस्या ठीक करेंगे. मुझे संध्या का पता भी मिल गया था और पानी की समस्या का निदान भी. इसलिए मेरे लिए हाँ में सर हिलाने के बाद वहाँ से निकलना ही ठीक था. जाते-जाते संध्या को एक नज़र भर और देख लेना की चाहत तो थी मगर शायद भोले नाथ की कृपा फिलहाल इतनी ही थी. वो दरवाजा खोलने के बाद अपने कमरे में चली गई थी.

उस दिन इतने करीब से संध्या को देखने के बाद उसकी सादगी और खूबसूरती ने मुझे और दीवाना बना दिया था. हर वक्त नजरें अब उसकी तलाश में रहती, पहली बार ऐसा लग रहा था जैसे मैं अपने पढ़ाई से अधिक किसी को चाहने लगा हूँ.

अब मुझे यहाँ रहते हुए महीने हो गये थे. बनारस की गालियाँ मुझे पहचानने लगी थी. रसीक काका की जलेबी कचौड़ी के बिना तो मेंरी सुबह ही नही होती थी. फिर दिनकर की वो स्पेशल चाय. जिसे पीकर मैं यूनीवर्सिटी निकलता तो दिनभर ताजगी बनी रहती. रहते रहते मोहल्ले के कई लड़कों से मेरी दोस्ती भी हो गई थी. अपरीचित थी तो सिर्फ संध्या. नाम के अलावा उसके अब तक और कुछ न जान पाया था.

हर दिन की तरह मैं आज फिर खिड़की पर खड़ा उसका इंतज़ार कर रहा था. लम्बे इंतजार के बाद वो आई तो जरुर मगर ठहरी नहीं. उसने तो आज मेरी ओर देखा तक नहीं था. कहाँ मेरी तमन्ना थी आज अपने साइलेंट मोड वाली इश्क़ के पड़ाव को पार कर आगे बढूँ, उससे कुछ इशारों में बात करू. मगर उसका यूँ मुझे नज़रंदाज़ कर चले जाना मेरा दिल तोड़ दिया था उस रात फिर नींद नहीं आई. कई सारे सवालों ने मेरी आँखों को पूरी रात जगाए रखा था. 

सुबह पंडित जी की परवाह किये बगैर मोहल्ले की लड़कों से संध्या के बारे में बातें कर रहा था. दरअसल मैं जानना चाहता था संध्या को. उसको समझकर खुद के दिल की मदद करना चाहता था लेकिन उन लड़कों से जो जाना उससे मेरे पैर तले जमीन खिसक गई थी.

Segment-3
मैं जानता था, बनारस की इस गलियो ने संध्या जैसे छोरीयों को हमें देखकर सिर्फ  मुस्कुराने भर का हक दिया था. हमसे बातें करने या मिलने का नहीं. आज फिर संध्या छत पर थी मगर आज मैं खिड़की पे नहीं बल्कि उसके पीछे था. उसकी नज़र मुझे नीचे खिडकियों में तलाश रही थी  और मैं उसके आगे आया और उसे अपने दिल की सारी बाते कह दी, वो बस मुझे ताकती रही और कहा तुम मेरा सच नही जानते इसलिये बेहतर होगा चले जाओ पिताजी तुम्हे कभी स्वीकार नही करेंगे मैंने कहा और तुम?

उसने कुछ कहा नही पर उसकी आँखों ने बहुत कुछ कहा मुझसे. मैंने कहा भोलेनाथ की कसम ..मैं तुम्हारे बगैर ओह, नही नही मैं पंडित जी से बात करूँगा वो जरुर मुझे समझेंगे. संध्या ने कहा और ये समाज ? समाज की मैं परवाह नही करता, समाज के फ़ैसले सही और गलत पर नही बल्कि खोखले दकियानूसी सोच पर पर आधारित है जहाँ कभी कभी एकतरफा फ़ैसले भी किये गए है, और ये कैसा समाज जहाँ एक बाल विधवा को दोबारा ब्याहने से रोका जाये. तुम्हारी शादी उस उम्र में हुई जब शादी का मतलब तक पता नही था तुम्हें. सजा के हकदार तो वो लोग है जिन्होने दस साल की उम्र में तुझे ऐसे बंधन में बाँधा जहाँ तुम्हारे लिये बंधन का मतलब  हथकड़ियों  से कम ना रहा होगा ! आगे 15 की उम्र में ही बाल विधवा, विधवा का मतलब पता था तुम्हे? खुद को देखो आईने में कौन हो तुम,  क्या चाहती हो, ज़िंदगी ने तुमसे नही तुमने ज़िंदगी से खुद को मिटाया है, आने वाली पीढी को क्या देना है तुम्हे, यह तय तुम्हे करना है, यह कहते कहते मेंरी आंखे नम हो गई थी. मेरा प्यार कभी भी तुम पर थोपा नही जाएगा. मैं हर फ़ैसले में तुम्हारे साथ हूँ. संध्या चुपचाप मुझे सुन रही थी फिर उसने कहा मुझे थोडा वक्त चाहिये, इतने में थोडा उतावला  होकर मैं बोला क्या तब तक हम दोस्त बन सकते है?सं ध्या ने पहली बार उंची आवाज़ में कहा बिल्कुल नही?

मैं रुआंसा सा हो गया था कि वो जोर से खिलखिलाकर बोली दोस्ती उम्र भर की चाहिये. मेरी खुशी का ठिकाना न था मैंने कहा देखो संध्या आज पूरा बनारस तुम्हारे साथ खिलखिला रहा है. क्या तुम अपनी नज़रो से मुझे बनारस नही दिखाओगी. जब मैंने संध्या से ऐसा कहा तो संध्या ने उदास होकर कहा, अब चौखट के अंदर ही मेरी दुनिया है. नहीं, अब दुनिया तुम्हारे चौखट तले होगी जो सब हुआ उसे भूल कर आगे बढ़ो. मेरे कहते ही लड़खडाती हुई आवाज़ से उसने कहा हाँ”.

मेरे दिल में एक साथ कई घंटे खुशी के बजने लगे. माँ इंतज़ार कर रही होगी, कहकर संध्या वहाँ से चली गई . मेरी आंखों के आगे वो लाखो दीये के चमक जो गंगा आरती के वक्त चमकते थे एकदम से चमकने लगे .
नीले रंग की सलवार कमीज़ और गुलाबी दुपट्टे में मेरा दिल अटक गया था, वाकई बनारस बहुत खूबसूरत है बुदबुदाकर मैं अपने कमरे की तरफ आ गया.

अब बस पंडित जी को कैसे इम्प्रेस किया जाये इसके लिये नये नये हथकंडे अपनाने के आइडिया आने लगे. संध्या को कैसे उसकी अँधेरी दुनिया से उजाले की ओर लेकर जाना है और उसे एहसास दिलाना है उसके सपने अभी खर्च नही हुए हैं.

दूसरे दिन मैं बाबा (भोलेनाथ) को मनाने मंदिर निकल पड़ा. चौखट से बाहर पाँव रखते ही बाबा की कृपा हुई. सामने पंडित जी अपनी बेटी संध्या के साथ कही जाते दिखाई दिये. मैंने पास आकर उन्हे नमस्ते किया और मुस्काता हुआ संध्या की तरफ देखा. झुकी हुई पलकों से जवाब में उसने भी मुस्कुरा दिया. फ़िर मैं निकल पड़ा बाबा के दर्शन को. तंग गलियों में आशिकी के गाने गुनगुनाते हाथ में एक पीतल का लोटा मंदिर के पास कुएं से जल भरा और बाबा को नहला दिया. दोनो हाथों से उन्हें सीने लगाकर बहुत धन्यवाद दिया. 

और फ़िर हम निकल पड़े युनिवर्सिटी. अब मन ही मन ठान लिया था कि पीएचडी की पढ़ाई कर प्रोफ़ेसर बन कर रहेंगे ताकि समाज और संध्या व उसके परिवार वाले उसके भविष्य को लेकर निश्चिंत रहें. 

उधर संध्या ने दोस्ती का वादा तो कर दिया पर उसे निभाएगी कैसे ?? अपनी ज़िंदगी के अनगिनत सवालो में वह उलझी हुई थी. समाज में पिताजी किसी को मुँह दिखाने लायक नही रहेंगें. 

पर कहीं न कही सूरज ने उसके दिल के किसी कोने में जगह कर लिया था, उसके साथ वो जीना चाहती थी कुछ सपने जो बंद मुठ्ठियों में कैद थे. उसे बेबाक जीने को मौका देना चाहती थी. 

सूरज अब कभी भी पंडित पंडिताईन की मदद करने से नही चुकता था. आंटे की बोरी और सब्जी के थैले ने तो उसे अच्छी तरह पहचान लिया था. संध्या की माँ का तो वह खास हो गया था अपनी माँ की तरह उनका ख्याल जो रखता था. घर में कोई मिठाई या स्पेशल चीज बनती तो भोग सूरज ही लगाता. संध्या भी अब पहले से खुश रहने लगी थी. उसके स्वभाव में बदलाव महसूस कर माँ बहुत खुश थी. अब तो सूरज का संध्या के घर आना जाना लगा ही रहता है. कम से कम इस बहाने संध्या से थोड़ी बाते हो जाती थी
आज मैंने संध्या को अपना वादा याद कराते हुए कहा मुझे अब तक किसी ने बनारस नही दिखाया. वो मुस्करा कर बोली हाँ, पर एक शर्त है मुझे पहले रसिक काका की कचौरी फिर लाला की कुल्फी और साहिद भाई की  पान खिलानी पड़ेगी. मैंने कहा पक्का, पर संध्या ने कहा माँ को पूछा कैसे जाय. आखिरकार फिर झूठ को सहारा लेते हुए उसने अपनी पुरानी सहेली साधना से मिलने की इजाजत माँगी. माँ ने झट से कहा जाओ पर अकेले नही जाना, सूरज तुम्हें छोड़ देगा. ये क्या ? सूरज हक्का बक्का. भला नेकी और पूछ पूछ. वो जनाब तो कब से इस ताक में थे. बस दोनों बनारस की तंग गलियों में खुद को चौड़ा किये चले जा रहे थे. संध्या कभी आसमां को देखती कभी गीली जमीं को जिसमें वो कभी धसना नहीं चाहती थी. उसने जोर से मेरा हाथ पकडा और कहा मुझे कभी मत छोड़ना. मैंने आंखो में आंखे डालकर संध्या से कहा तुम्हे छोड़ना मुझे मेरी जिंदगी छोड़ने के बराबर है. तुम्हारी खुशियों की दीवार से ही हमारा आशियाँ बनेगा. संध्या मेरे सीने पर सर रखकर फफक पड़ी. मुझसे शादी करोगे संध्या ने धीमे से कहा. 

मैंने कहा, नहीं पहले सगाई फ़िर शादी. सामने गंगा की तरंगो ने भी उछल कर जैसे हामी भर दी. ये वो शाम का वक्त था जब सूरज और संध्या एक साथ आसमां में मिल रहे थे और एक संध्या सूरज जमीं पर.

गंगा के किनारे बैठे हुए दोनो बस प्यार भरी बाते करते रहे, तभी वक्त ने आवाज़ लगाई. सूरज ने कहा अब शर्त भी तो पूरी करनी होगी वरना मेरी प्रेमिका बीवी बन जायेगी. दोनो ठहाके लगाकर अब चल पड़े.

बनारस की हर वो चीज आज बेहद खूबसूरत लग रही थी जिसे हमेशा मैं नजरअंदाज कर देता.  तभी मैंने सर झुकाते हुए संध्या से कहा, कहीं हम माँ को धोखा तो नही दे रहे. हमें आज सबकुछ माँ बाबा को बता देना चाहिए. पहले तो संध्या थोड़ी घबराई फिर राजी हो गई.

घर पहुंचे तो एक सरप्राईज हमारे लिये वहाँ मौजूद था. ‘साधना’ ये वही साधना थी संध्या की सहेली, जिसका बहाना बनाकर संध्या मेरे साथ बाहर गई थी. माँ ने संध्या को एक थप्पड़ जड़ते हुए कहा  मुझे तुमसे ये उम्मीद बिल्कुल नही था. सूरज की तो बोलती बंद थी. माँ ने मुझसे कहा चले जाओ हो सके तो ये मोहल्ला ये शहर छोड़कर चले जाओ. 

तभी दोनो एक साथ बोल पडे हम शादी करना चाहते है. माँ ने आश्चर्य होकर संध्या की ओर देखा, कल तक खाने के लिये भी न खुलने वाली जुबान आज कैसे खुल गई? तुम कुछ नही जानते सूरज माँ के बोलते ही उनकी बात को काटते हुए सूरज ने कहा यही न कि ये बाल विधवा है. हाथ जोड़कर सूरज ने कहा और  माँ की गोद से लिपट गया. औ ना मैं माँ खोना चाहता हूँ ना ही प्यार. प्लीज माँ मेरी मदद करो. आखिर  माँ ने उनकी खुशियों की खातिर समाज और परिवार से भी बगावत करने को ठान ली. और अब किसी बेटी के साथ अन्याय नही होगा, माँ बोली.

इतने में पंडितजी भी आ गये. जब सारी बाते उन्हे पता चली तो एक बार फिर से तांडव हुआ पर आखिर में सबने मिलकर उन्हें भी मना ही लिया. भला अपनी बेटी को कौन पिता खुश होते नहीं देखना चाहेगा. पर सूरज को उन्होने अपने कैरियर बनाकर ही शादी करने की रजामन्दी दी वो भी यही चाहता था सूरज अब प्रोफ़ेसर बनने की तैयारी में लग गया. 
पर समाज में ये बात आग की तरह फैल गई बाल विधवा की शादी. कभी नहीं. लोग अपने आचरण को ताला लगा कैसे कैसे ताना पंडित के परिवार पर कसने लगे. बहुत कम लोग इस बात को सही मान रहे थे. दरअसल ऐसे लोग समाज में कुरीतियाँ फैलाकर एक बेकसूर को  को कसूरवार बना डालते है. 

सूरज उनकी परवाह न करते हुए अपने परिवार के पास जाता है उनके नानुकुर के बाद भी उन्हें  मना ही लेता है. 

दो साल बाद मैं प्रोफ़ेसर की डिग्री लेकर अपने परिवार के साथ पंडितजी के घर पहुँचता हूँ और शादी का आग्रह करते हुए संध्या की ओर देखता हूँ. पंडितजी की आँखों में खुशी के आँसू थे. उन्होने हाथ जोड़ कर मेरे पिता से कहा, आज मेरी बेटी को किसी ने फिर से जीवित कर दिया. मेरे पिता ने उन्हे गले से लगाया पर असल में संध्या के साथ से ही यह सब कुछ संभव हो पाया था.

समाज की परवाह ना करते हुए इस परिवार ने दोनों जोड़ों के ब्याह रचाये. 

ऐसा सूरज हर घर में पैदा हो, इसकी कामना करते हुए मैं जूली इस कहानी को यहाँ समाप्त करती हूँ.

 
जूली अग्रवाल 
कोलकाता