क्यों आज भी बेटे और
बेटियों में फर्क  होता  है ?

क्यों  आज  भी.... 
बेटे के जन्म से खुशी और 
बेटी के जन्म पर मातम होता है। 
     
क्यों आज भी....       
बेटे को महंगी कमीज और 
बेटी के हिस्से में 
सस्ता फ्रॉक होता है।   
                   
क्यों आज भी....  
बेटे को पब्लिक स्कूल और 
बेटी को सरकारी स्कूल मिलता  है।           

क्यों आज भी....  
बेटे के हिस्से में मक्खन और 
बेटी को सिर्फ दूध मिलता  है।          

क्यों आज  भी....  
बेटों को सोफे का आराम और
बेटियों को घर का काम मिलता है।       

क्यों आज भी....    
बेटों को डाक्टर की पढ़ाई और
बेटियों को बस आदर्शों का 
ताज  मिलता है।                                           

सवाल है मेरा सबसे बस ये..                                   
क्यों आज भी....                                                  
बेटों को पहचान और
बेटियों को पराया नाम मिलता है।

 

*पुनीता सिंह
  नई दिल्ली
दीन हीन फकीर,
पहुँच गया सरकारी अस्पताल में;
स्वास्थ्यकर्मियों ने अनदेखी की,
छोड़ दिया उसे उसी हाल में.

मरीज कुछ ज्यादा समझदार था,
समझ गया माजरा एक नजर में;
कहते यह चल दिया वहां से,
डालकर हाथ अपनी कमर में.

दूर से देखा, सोचा था मन में,
जन्नत है या दरगाह है;
मगर आकर अब पता चला,
यह तो अदद सरकारी कब्रगाह है.


पी० बिहारी ‘बेधड़क’
कटाक्ष कुटी, महाराजगंज (मधेपुरा)
चलभाष- 9006772952
डेग-डेग पर झूठ की खेती।
दुष्कर्म के बाद मार दी गई  
कलुआ की बेटी।।
थाना बैठा, पंचायत बैठी।
खूब हुई पैसै की खेती।।
कलुआ भी मजबूर था।
दुष्कर्मी काफी मजबूत था।।
तमाम गवाहों, सबूतों के मद्देनजर  
न्यायालय का आया फैसला।
कलूआ को थी ही नहीं बेटी !
राशन कार्ड, वोटर पहचान पत्र में
नहीं था कलुआ की बेटी का नाम।
ना तो बैंक में था खाता,
ना ही किसी स्कूल के रजिस्टर में  
था उसका नाम।
कलुआ को चेतावनी दी गई,
आगे से झूठा मुकदमा करने पर  
उसके उपर होगा मुकदमा।
कलुआ के परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है।
यह फैसला व्यवस्था पर सवाल है।।
कलुआ की एक बेटी और जवान है।
वह सोच-सोचकर परेशान है।।


प्रवीण गोविन्द, जर्नलिस्ट
सुपौल
महँग भेल
धान गहूँम
दलहन आ तेलहन
सबटा महँग भेल
दिन दुगुन
तें राति चौगुन।
ईंधन महँग
पानि महँग
नव-नव कंपनीक
दवाई महँग
डाक्टरक फीस
आ ईलाज महँग
आ सब सँ
अधिक जे
भेल महँग,
ओ थिक
अपन लोक
जे हाकिम बनि
गाम आ
परिवार सँ
कोसो दूर
शहर मे
बसल छथि
हुनकर
दर्शन महँग
हुनक विचार
आ व्यवहार महँग।
सस्ता भेल
जा रहल अछि
सोना आ चानी
मोटर गाड़ीक
डीजल आ पेट्रोल
संगहि
सौन्दर्यक प्रसाधन।
अहीं ठा
मोन पड़ैत अछि
पुरना ई फकरा
जे~~~~~~
"पेट में खर नञि
आ सींग में तेल।"



स्वाती शाकम्भरी
सहरसा
इल्म है खूबसूरती
का हमे भी,
तभी तो अक़ीदत से
झुक गये है हम,
तू क्या है सिर्फ़
तुमको नहीं मालूम चाँद
एक यही बात,
फिर से कह गये है हम,
पड़े जो नज़र इनायत की
तेरी मुझपर कभी
एक यही तसव्वुर लिए
हर घड़ी बढ़ रहे है हम
पहुँच ही जायेंगे किसी दिन
तेरी दहलीज तक, जो तू न आई तो,
एक यही आरज़ू लिए अब जी रहे है हम !!
 
अजय ....
जान गँवा कर भी अपनी,
जान पाई ना ये बात |
क़सूर भला क्या था मेरा ,
छीनी अस्मिता मेरी उस रात |
कुछ कहते देवी का स्वरुप,
बस कहते ही . .

जन्म से समाज के
इस दोहरे नियमो में पली |
तन-मन पर खोखले
रिवाजों की प्रताड़नाएं सही . .
सदियों से किया अस्तित्व का संघर्ष,
बस करती ही रही |

बहुत रोई थी मैं, गिड़गिड़ाई   थी . .
सब से लगाई थी मदद की गुहार |
पर शरीर क्या, मेरी आत्मा को भी,
उन ज़ालिम दरिंदों ने किया तार-तार |
ये सच नहीं कि मैं लड़ी नहीं . .
देखना चाहती थी पूरा संसार |
पूरे करना चाहती थी वो ख्व़ाब,
 जिन्हें संजोए था मेरा परिवार |
यूँ तो छूट गयी साँसों की डोर
पर लगा देश अब जागा है |
जीते-जी ना बदला जो क़ानून,
सबका उसे बदलने का इरादा है |

पर गलत थी मैं...
उस नाबालिग़ वहशी को,
कानून की छूट और पुरस्कार मिला |
न मिल पाया इन्साफ मुझे,
दामन में बस तिरस्कृत हार मिला |
खूब लौटाए सम्मान तुमने अपने,
अब जाकर कहाँ बैठे हो मौन?
मान गई आज “अंधा है क़ानून’’,
इन्साफ मांगने वाला 
अब बचा कौन ???

श्रेया वर्मा
मधेपुरा