वामा, तुम्हारी स्वयं- सृजित
अवधारणा ही तुम्हारी
वर्तमान अधोगति का
मूल कारण है
जिसके तहत अपने
अत्म-सत्य से
डांवाडोल होकर
ब्रह्मांड को मापने का तुमने
अभियान छेड़ दिया है।
यह आत्मघाती भी
हो सकता है।
तुम्हारे आन्दोलित अन्तर्जगत के
काने-कोने में
विघटनकारी विचारों का
घात प्रतिघात होता रहता है
और विद्रुपताओं से
संघर्ष विराम कर तुमने
उसे मौन स्वीकृति भी,
प्रदान कर दी है
यह मान कर कि
आदम, आदमी के
रूप में तो बदला
पर उसकी आदिम
आत्मा नहीं बदली।
हजारों साल बीते पर
आदम की आत्मा नहीं बदली।
तुमने यह धारणा
बना ली कि अब भी
आदम की जात
उसी आदिम अंधे-युग का
एक आदमखोर है।
यह कितना अनर्गल विचार है।
इन्हीं विचरों को
आत्मसात कर तुम
उठ खड़ी हुई और     
पुरूष सत्ता की
विकृतियों के विरूद्ध     
तुमुल उद्घोष करती    
स्त्रियों की दिगत्त-व्यापी    
कतार का प्रतिनिधित्व करती  
हाथ में मुक्ति का
अभय ध्वज लहराती चल पड़ी।
तुम केवल प्रकृति हो
सुनो, सम्बन्धों को
वामपंथ की तुला पर मत तौलो।
ब्रह्मांड है पुरूष
ब्रह्मांड को मापने का
प्रयास ही तुम्हारी
त्रासदी का मूल कारण है।
*संतोष सिन्हा
अधिवक्ता, मधेपुरा
(संपर्क: 9576111853)