इस दरिया में, अब कोई लहर तो नहीं है ।
ये खामोशी, तूफान का असर तो नहीं है ?

गमों को भुला दूँ ..कि फिर मुस्कुरा दूँ..
ये आसान इतना, सफर तो नहीं है 

जिसकी तमन्ना थी हमने सजाई ....
ये वो सुहानी सहर तो नहीं है 

किसी को भी गले लगाने से पहले,
देख लो, उसके हाथ खंजर तो नहीं है ।

बढ़ गया पाप है, इस हद अब धरा पर,
किसी को भी खुदा से कोई डर तो नहीं है।

जन्म लेंगे कई और गांधी, भगत सिंह...
ये जमीं हिन्द की, बंजर तो नही है ।

जो मिलोगे राह में तो, मुँह फेर लें हम,
नफरत तुझसे, इस कदर तो नहीं है ।

               
रचना भारतीय
मधेपुरा, बिहार।
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1 Response
  1. Didi aap jab bhi kuchh likhti ho bahot hi sahaj bhaw k sath aisa kuchh likhti ho jisko agar har koi aaj kal apne jeevan me utare to wo khud ek behtareen insan banne ke sath sath apne samaj ko bhi behtar bana sakta h.
    Aap ke is mahan chhamta ko naman karta hu or aasha karta hu ki aage bhi aapke isi tarah k or bhi lekhni se hum sab labhanvit honge.....
    Pranam di


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