जो कहा सब सुना जो किया सब सहा
यूँ कोई आदमी आदमी ना रहा

कर रहा था कोई ज़िन्दगी को बयाँ
हो गया वाकया जो कहा अनकहा

इक मुसाफ़िर खुशी ढूँढता था जहाँ
तानकर गम की चादर वहीं सो गया

तू सलामत रहे बस यही इल्तिजा
दे दुआ तू मुझे या कि दे बददुआ

कर रिहा, दे सज़ा, है तेरा मामला
दे रहा है गवाही मेरी खुद खुदा

अमन
सिंघेश्वर, मधेपुरा
(बिहार)
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