सब ने अपना कुछ दिया,
कुछ ने अपना सब दिया,
खायी जिस्म पर गोलियां,
बदले मे आजाद वतन दिया।

लहूलुहान हुआ था जो भी सीना,
ना हिन्दू ,सिख, ना मुसलमां था,
सरजमीं के मान के लिए,
सो गया सदा के लिए,एक इन्सां था।

आओ इस आजादी को मिल कर जिये,
दिल से दूर कर हर शिकवे-गिले,
बड़ी मुद्दत से आई ये सुहानी सुबह,
भेदभाव की धुंध से इसे न धूमिल करें।

पर इक सवाल है मन में कौंधता,
इन खुशियों को कुछ तो रौंदता,
जो कसमें खाई थी वीरो ने,
मन उन्हें दिलों में है ढूंढता।

बैर करना न कभी सिखाया था,
भाईचारे का पाठ बस पढाया था,
तिरंगे की शान में बहाकर लहू,
वीरो ने सदभावना को धम॔ बताया था ।

अब बस ठान लें,यह मान लें,
सब एक हैं , इन्सान हैं,
सब पर ऋण है भारत माँ का,
उनकी ही सब संतान हैं।

धम॔ और ऊॅच-नीच की दीवार को गिराऐंगे,
तिरंगे को विश्व की चोटी पर लहराएगें,
चाहा था जैसा मातृभूमि के वीरों ने,
देश को उससे भी बेहतर सजाएंगे।।


- श्रेया वर्मा
मधेपुरा
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