मैं जा रहा हूँ पता नहीं
फिर कब बात हो
अपना ख्याल रखना.

यही कुछ आखिरी शब्द थे
तुम्हारे जो मेरे इनबॉक्स में
तुमने लिख कर छोड़े थे.

उस दिन से आज तक
कितनी बार मैंने इनको पढ़ा है.

इक-इक शब्द जैसे...
दिल में गढ़ गये हो.

जितनी बार इन शब्दों को पढ़ती हूँ.....
ऐसा लगा कुछ अधूरे से लगे....
जैसे तुम कुछ और
भी कहना चाहते थे
अगर मैं होती.

इक कसक सी दिल में
तुम ले कर चले गये.

वैसे तो मैं हर रोज़
तुम्हारा इन्तजार करती थी पर
उस दिन चूक गयी.

मैं क्यों नहीं थी?
जब तुम जा रहे थे.

बार-बार उस इनबॉक्स में पड़े
मैसज को पढ़ मैं सोचती हूँ.

मैं तुमसे क्यों नहीं कह पायी कि
मैं तुम्हारा इन्तजार करुँगी.

कुछ अधूरा  सा अनकहा
तुम लिख कर छोड़ गये.

कुछ अधूरा  सा अनकहा
मेरे दिल में रह गया.



सुषमा आहुति (लेक्चरर, कानपुर)

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