शिक्षक ने देकर दुआ
हमारे अन्तर्मन को छुआ
और प्रश्न किया
नेता उदास क्यों था ?

शिक्षक खड़ा क्यों था ?
हमने कहा श्रीमान !
आपका प्रश्न बिलकुल गलत है
क्या आपको शराब की लत है
सही प्रश्न यह है
गधा उदास क्यों था ?

साधु प्यासा क्यों था ?
इसका उत्तर लोटा है
जो हमें मौखिक रटा है
और हमारे दिल को भी पटा है.

गुरूजी बोले बेटा !
इस घोर कलयुग में
जहाँ इंसान इंसान को खा रहा है
वहां ऐसे प्रश्नो का कोई औचित्य नहीं होता है.

ये आत्मा बड़ी दुखती है जब हमारे देश का
कानून, समाज, सभ्यता-संस्कृति सहित सूने
वन में जाकर रोता है
तुम ही सोचो !

गधे और साधू वाले सही प्रश्न की तरह
ना वैसे ईमानदार, वफादार, परिश्रमी गधे रहे
और ना ही वैसे तपस्वी मानवतावादी जितेन्द्रीय साधू
.
इस घोर कलयुग में समय के घूमते पहिये और
स्वार्थ ने सभी शब्दों के अर्थ और उनकी
परिभाषा बदल डाला है.

इसीलिए मैनें इस प्रश्न का स्वरूप समयानुसार
बदल कर यह कर डाला है
कि नेता उदास क्यों था ?

और शिक्षक  खड़ा क्यों था ?
हमने गुरूजी के मर्म को
और उनके पावन धर्म-कर्म को
पहली बार अच्छी तरह जाना
और चिड़ियाँ की आंखं की तरह
उनके लक्ष्य को पहचाना.

हमनें कहा गुरूवर !
वर्तमान घोर कलयुग का समय है
जहाँ  मानवता और लज्जा को गिरवी रखकर
युद्ध, धर्म, सत्य, न्याय पाने के लिये ना होकर
स्वार्थ सिद्धि और सत्ता रूपी कुर्सी पाने के लिये होता है.

युद्ध परिवार का हो, समाज का हो
या विश्व का
नेता उदास हो या शिक्षक खड़ा
उसका प्रमुख कारण यही है
केवल कुर्सी नहीं है.



विशाल शुक्ल 
छिंदवाडा  (म०प्र०)
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