बारिस में भींगा हुआ
ये शाम का आँचल
फिर उजाला खो रहा है,
आसमां भी बादलों के पलक
बंद कर फिर सो रहा है.
मद्यम होती हवाएं फिर
तेज होकर चल रही हैं,
ये शाम ढल रही है,
ये शाम ढल रही है.

खेत खालिहानें,
पठारें फिर मचलके खिल रहे हैं,
ऐसा लगता है कि धरती
आसमां से मिल रही है,
और इस मिलन से आसमां में
चिंगारियाँ चल रही हैं,
ये शाम ढल रही है,
ये शाम ढल रही है.

दूर शहरों में रोशनी ने
कब्ज़ा कर लिया है,
इस अर्द्यरजनि की लालिमा को
अलविदा सा कह दिया है,
पर इस विरह से मेरे दिल की
ख्वाहिसें जल रही हैं,
ये शाम ढल रही है,
ये शाम ढल रही है.
 
आदित्य सिन्हा, मुंबई
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