झर -झर बहते झरने
कल -कल बहती

नदियों की आवाजें
मानो गुम सी हो गई हो

या हम बहरे हो गए
ये समझ में नहीं आता

सोच यहाँ है कि शायद
कैद कर लिए होंगे

प्रदूषणों के पिंजरों में
किसी ने इन मीठे शोरों को

पर्यावरण को बचाने  हेतु
शुष्क कंठ लिए मृगतृष्णा सा

भटकता इंसान
क्या इन्हे मुक्त कर पाएगा

श्रमदान से नदियों को पुनर्जीवित करके
इंसान माँग ले यदि वरदान

भागीरथ सातो फिर से
झर -झर बहते झरने

कल -कल बहती नदियों की आवाजें
इस धरा पर पा  सकता है


संजय वर्मा "दृष्टि "
125, शहीद भगत सिंग मार्ग
मनावर जिला -धार (म प्र )
  
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