देश को सुभाष सा ही नौनिहाल चाहिए,
जागरण का गीत बन जले हमारी साधना में ,
सोच को पुनीत क्रांति की मशाल चाहिए,
जो झुका सके महान -शक्तियों को राह में ,
देश को सुभाष सा ही नौनिहाल चाहिए,
घिर रही थीं आंधियां,स्वदेश के विहान में ,
शृंखला में कैद थी,माँ भारती की चाहतें ,
स्वतंत्रता की ज्योति को नूतन प्रकाश चाहिए
देश को सुभाष सा ही नौनिहाल चाहिए,
जिसको न ग्राह्यथी कभी,दासता की सोच भी,
जिसकी दृढ़ पुकार में,था स्वाभिमान ,रोष भी,
फिर उसी पुकार में, उग्र ज्वाल चाहिए,
देश को सुभाष सा ही नौनिहाल चाहिए,
तुमने दी आवाज,सब चले ,मिला कदम -कदम,
गूंजे फिर' जय हिन्द' की पुकार ,बाजुओं में दम,
आज फिर आह्वान में,गर्जन कराल चाहिए,
देश को सुभाष सा ही नौनिहाल चाहिए,
नारीयों को मात -सम,गौरव दिया ,सम्मान भी,
नूतन, सृजन निर्माण का,सपना दिया, ललकार भी,
हौसलों में दम लिए ,वारिधि विशाल चाहिए
देश को सुभाष सा ही नौनिहाल चाहिए.


 
 पद्मा मिश्रा
 जमशेदपुर
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