जब आता है वो नन्हा फरिश्ता...
चंदा की किरणो से उतर कर 
चुपके-चुपके नन्हीं  आँखों के सपनो सा,
आता है, खुशियां बाँट जाता है,
धरती के दामन पर-खिलते हैं...
मुस्कराहटों के फूल.
जब आता है वो नन्हा फरिश्ता...
मुरझाये चेहरों पर कलियाँ चटकती हैं,
गुनगुनाती हैं घंटियाँ..
जिंगल बेल-जिंगल बेल.
इस साल क्या क्या लाएगा नन्हा फरिश्ता ?
भूखे को रोटी, दुखियारी रातों का सूरज,
माँ की गोद, गीली आँखों में कोई प्यारा सपना,
गूंजती हैं घंटियाँ, बच्चे खुश हैं -
पाकर अपना मनचाहा खिलौना, भूल जाते हैं
अगले दिन की कड़वाहटें, भूख, बेबसी
पर तुम आना जरुर, ओ नन्हे फरिश्ते  !
जिंगल बेल्स-जिंगल बेल्स.....


पद्मा मिश्रा, 
जमशेदपुर
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