है मन में जन्मों की नफरत,
हाथों में लिए गड़ासे है ....।
भारत माँ को छलनी करते,
ये लोग लहू के प्यासे हैं...।

लड़ते-लड़ते मिट जाएँगे....
इन्हें भला समझाए कौन  
नेता जी साजिश में गुम हैं  ,
संसद भी बैठी है मौन ....।
प्रेम खो गया जाने कहाँ.....
टूटी हुई विश्वासें हैं.........।
ये लोग लहू के प्यासे हैं   

न संकट में है रहीम......
और न खतरे में राम है 
सच पूछो तो भाई मेरे....
बस खतरे में इन्सान है ।
"खतरे में है धर्म........."
ये तो राजनीति के झांसे हैं।
ये लोग लहू के प्यासे हैं  

कत्लेआम मचाने में क्यों
दर्द न होता है इनको .....।
अपने धर्म की बातों का भी
कद्र न होता है इनको ....।
सोंच-समझ मर गयी क्यों  इनकी
क्यों मरी हुई अहसासें हैं......।
ये लोग लहू के प्यासे हैं  

मानवता के धर्म को मानो
है सबकी खुशियाँ  इसमें ,
नफरत ,हिंसा की जगह नही..
बस प्यार की है दुनियाँ इसमें ।
है उनसे मेरी गुजारिश ये...
जो लोग लहू के प्यासे हैं 
जो लोग लहू के प्यासे हैं 



रचना भारतीय,
 मधेपुरा, बिहार ।
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