हर सिम्त भागते हैं
मेरे शहर के लोग,
रातों को जागते हैं
मेरे शहर के लोग  
जो कतरनें बची हैं साँसों की,
उन्हें जीते ही नहीं  
और ज़िन्दगी माँगते हैं  
मेरे शहर के लोग ।  
मतलब की मिटटी हो तो  
खिलाते हैं रिश्तों के फूल,
हर दाँव जानते हैं
मेरे शहर के लोग। 
जिसने उन्हें सहलाया  
चिलचिलाती धूप में,
उन दरख्तों को काटते हैं  
मेरे शहर के लोग ।  
हर मोड़ पर लगाकर  
ज़ख्मों की एक दूकान  
क्यूँ दर्द बाँटते हैं  
मेरे शहर के लोग  



कल्याणी कबीर
जमशेदपुर
2 Responses

  1. Bahut khub Kalyani ji! Aapne in panktiyon se har shahar ki baat kahi hai. Bahut bahut badhai!
    Mere do sher kabul karen jo shahar ki halat par h:
    शहर में ये कैसी आवाज है
    आसमाँ में कैद परवाज है
    नजर से नजर तो मिल जाती
    जी चुराते लोग क्या राज है
    -- Manoj 'Aajiz'
    Jamshedpur


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