प्रकृति से लिपटी धरोहर मेरी 
कुँमो गँडु मे फैला आँचल
मै और मेरी वन सम्प्रँधा
अनत् रुप मे बिखरे शाँखा
अदभुत रचना सँस्कृति मे मेरी
देव नाम का शँखनाद उजागर
मै हुँ उत्तँरा
देवलोक कि तप भुमि
महाकाव्य कि बाँहे फैली पथ रेखा
मै हुँ उत्तँरा

ओ रि उत्तँरा
क्या कहुँ अब मेरी उत्तँरा
क्या-क्या ना उजड़ा
दारुण (असहाय्) जैसा
दिशा हिन को उडते पँछि
तेरी बोली मँड्डवे कि खेति
कागज मे चलती पैसो मे बनती
विवश रुप मे बैठि सँस्कृति तेरी
देव वाँद्य भी वैराग्य औठँ मे
अब ये समृद्धि उत्तँरा तेरी
तिमिर हो रही जड़ चेतना तेरी
बँजर से होती तेरी सँस्कृति
फैन्शी फैशन विराणि सँस्कृति
वैभव के कारण मोक्ष प्राप्ति
तत पे बैठा पहाडि मानव
पहेचान भुला के तृष्णा ले के
छोड चले रे आँचल तेरी
भुला रहे ये सँस्कृति तेरी
प्रकृति से लिपटी सुन्दर धरोहर
कोई खोदे आँचल जल स्रोत किनारे
कोई सुखाऐ तेरे नव जीवन चेतन
ओ रे उत्तँरा
तूँ और तेरी विकल वेदना
बेसुद होती उत्तँरा सँस्कृति आँचल
ओ रे उत्तँरा
कँहा गये ये हुँडकि ढोल
सुने मे नही आते कोई बोल
क्या ये तेरी रित-रिवार्ज कि पिड़ा है

या मैरे कलम को हो रहा है
भ्रँम र्निदेश…? भ्रँम र्निदेश…? भ्रँम र्निदेश?


सुन्दर कबडोला
गलेई- बागेश्वर- उत्तराँखण्ड
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