कब छोड़ चला वो बचपन मुझको,
मुझको कुछ भी याद नहीं
क्या मांगू अब किसे पुकारूँ,
सुनता कोई फरियाद नहीं
नादानी थी ऊपर मेरे,
चाँद की मै हठ कर बैठा
रूठ गया है बचपन मुझसे,
तब से खोया सा मै रहता
रिमझिम बादल बरस पड़ते थे,
नौका कागज की मैं खेता
तितली जुगनू खेल खिलाते,
थक हार कर तब मैं सोता
कब छोड़ चला वो बचपन मुझको,
मुझको कुछ भी याद नहीं
क्या मांगू अब किसे पुकारूँ,
सुनता कोई फरियाद नहीं ...


राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी'
5 Responses
  1. कब छोड़ चला वो बचपन मुझको,
    मुझको कुछ भी याद नहीं
    क्या मांगू अब किसे पुकारूँ,
    सुनता कोई फरियाद नहीं ...सुन्दर भैजी ....


  2. बहुत खूब, बचपन का चित्रांकन .....


  3. बहुत खूब, बचपन का चित्रांकन .....


  4. Unknown Says:

    तितली जुगनू खेल खिलाते,
    थक हार कर तब मैं सोता
    कब छोड़ चला वो बचपन मुझको,
    मुझको कुछ भी याद नहीं
    ...बहुत सुन्दर पक्तियां!


  5. बलबीर जी, मुकेश जी एवं अरुणा जी आप सब का बहुत बहुत धन्यवाद आप सब का अपार स्नेह और आशीर्वाद सदा यूँ ही बना रहे यही आशा है


टिप्पणी पोस्ट करें