चर्चा, चर्चा, चर्चा
जहाँ देखो चर्चा
घर हो दुकान
शहर हो या गाँव
चर्चा
दो की तीन चाय पर
राजनीति पर
राजनेताओं पर
पाक कर
सीमा विवाद पर
आतंकियो-
नक्सलियों पर
मन्दिर-मस्जिद,
समझौतो पर-।
संसद के अंदर-बाहर
होती हैं चर्चाये
परन्तु-
दबजाती हैं व्यर्थ के
शोर-शराबे में।
आम सहमति-
अपनी सुविधाओं पर
लेकिन-
चर्चा नहीं होती कहीं
आटा,घी,तेल, मिश्री के बढ़ते
मूल्यों,
लग रहे दर्जनों टैक्सों
आम आदमी की
रोटी के लिए तरसतें रामू की
हां रामू की,
धृतराष्ट्रों के शासन में
रोटी की भूख की
गरीबी से हाथ फैलाते पसारते
दूसरों के सामने गनेशी
के नन्हे- नन्हे हाथों की
उसके खुले आसमान के
नीचे रात गुजारने की
विवश घिसटते अपाहिज
पावों की
जो आवश्यक कहीं अधिक
मंदिर- मस्जिद, पाक और
परमाणु से
तभी- सार्थक हो सकेगी
चर्चा
कवि व उसकी कविता।।


शशांक मिश्र भारती
शाहजहाँपुर, उ०प्र०
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