हमारी
नायिका
अनभिज्ञ है
बोतल
के ढक्कन को खोलने से
ग्लास
में बर्फ, सोडा और अंगूर का रस घोलने से
करती है
नफ़रत
हुक्का की गड़गड़ाहट से
पैग लिए
हाथ में
नहीं लेती
कश सिगरेट की
डांसबार
में फ्लोर पर नहीं सोती मदहोशी के आगोश में
हमारी
नायिका
चीरती है
धरती को
खेत
उसकी किताब है
और
हल
उसकी कलम
और
नमी
उसकी स्याही
कुदाल और फावड़े से
है गहरी उसकी दोस्ती
उगाती
है जांगर के जोर से फ़सलें
यहीं
है हमारी नायिका का सृजन शास्त्र
नीला आसमान
है उसका चादर
और
वसुंधरा
उसका बिस्तर
खेत
का मेड़ है
तकिया उसके
सोच के सौंदर्यशास्त्र का
लेता है
यहीं फुनगी
बारिश उसकी सखी
और
बादल सखा
यहीं है हमारी नायिका का आधुनिक श्रमशास्त्र...


डॉ रमेश यादव
सहायक प्रोफ़ेसर
इग्नू, नई दिल्ली
1 Response
  1. शुक्रिया बहुत-बहुत भाई राकेश जी !
    श्रमशास्त्र पर बहस को आगे बढ़ने के लिए...!


टिप्पणी पोस्ट करें