चखा
हमने
स्वाद बेरोजगारी की आज़ादी का
बेफ़िक्र
अकेले जीवन की देखी स्वतंत्र लहरें
दिमाग को नौकरी के
जंजीरों में बंधते देखा
दिल को ठगते
दृष्टि को बिगड़ते देखा
जीवन को जिम्मेदारियों के
बोझ तले दबते देखा
प्रेमिका को मुँह फुलाकर सोते देखा
माँ
को चूल्हे में आग फूंकते देखा
भूख से तड़पते पेट को सोते देखा
जब से
एक से हुए दो
आज़ादी को गुलामी में
करवट लेते देखा



डॉ रमेश यादव
सहायक प्रोफ़ेसर, इग्नू 
नई दिल्ली 
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