राष्ट्रकवि स्व० मैथिलीशरण गुप्त ने निरीह अबला उर्मिला की दयनीय दशा से आहत होकर लिखा: 
अबला जीवन हाय ! 
तेरी यही कहानी,
आँचल में दूध और 
आँखों में पानी.
लेकिन आज माजरा कुछ और नजर आ रहा है-
सबला जीवन आह ! 
तेरी कटु कहानी,
हाथों में सैंडिल और 
देती गालियाँ जुबानी.

कभी पत्नी पीड़ित पतियों द्वारा अपना संघ बनाने की खबर पढ़-सुनकर हंसी आई थी. भला पुरुष प्रधान समाज में औरत की ऐसी जुर्रत ! कभी-कभार पुरुषों के प्रति नफरत-रोष प्रदर्शित करने की गरज से औरत बेलन और हाँडी की आवश्यकता जरूर महसूस करती थी, लेकिन आज की हालात कुछ और है. शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन में औरत जहाँ कैंडिल मार्च में भाग लेती है तो कभी और कहीं भी सैंडिल लेकर प्रहार से पतिदेव की पूजा करती नजर आती है. चाहे कोर्ट-कचहरी परिसर ही क्यों न हो ? बेचारे पतिदेव की स्थिति पतितदेव सी हो जाती है.
        अनादिकाल से पुरुषों ने नारी को देवी की संज्ञा देकर खुद को धन्य समझ रखा है. तभी तो दुर्गा को शेर पर और सरस्वती को हंस पर बिठा कर शक्ति और ज्ञान का स्रोत समझकर उसके आगे अपना शीश झुकाते आया है.
          लेकिन पाखण्ड और धूर्तता की पोल तब खुली जब राम के इशारे पर लक्ष्मण ने सूर्पणखा की नाक काट डाली फिर अपनी पत्नी को राम अपहर्ता रावण के चंगुल से मुक्त कर नारीत्व की परीक्षा तक ली. सस्ती लोकप्रियता के चक्कर में उसने गर्भवती सीता को जंगल की ओर हांक दिया. इतना ही नहीं पुरुषार्थियों के महाकुम्भ और महारथियों की सभा में कुलवधू द्रौपदी की साड़ी खींचने की विशुद्ध भ्रष्टाचारियों सी छूट दुराचारी दुशासन को मिल गई. यहाँ लेकिन-वेकिन, किन्तु-परन्तु की गुंजाईश धूर्तता की कसौटी पर ही निकाली जा सकती है.
          यह सच है कि विवाहेत्तर प्रेमजाल में उलझकर कभी पति ने पत्नी का बेड़ा गर्क किया तो कभी पत्नी ने ही पतिदेव की रसीद कटवा दी. आज औरत अपनी महत्वाकांक्षा की बलिवेदी पर अपने पीहर और नैहर की मर्यादा को कुर्बान करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है.
          जहाँ केन्द्र सरकार तैंतीस प्रतिशत हक आधी आबादी को देने में टाल-मटोल करती रही है वहीं अपना बिहार उदारता दिखाकर पचास प्रतिशत की सौगात दे डाली. गाय मारकर जूता दान करके प्रायश्चित कर डाली.


पी० बिहारी बेधड़क
कटाक्ष कुटीर
महाराजगंज, मधेपुरा.
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