हे मानव ! तू ऐसा ना कर
किसी के जिन्दगी से यूँ खेला ना कर,
जिस कोख को बनाया खुद तूने हीं
उसे जन्म से पहले यूँ मारा न कर,

जो जननी कहलाती है हमारी
उसी पर नजर क्यूँ है तुम्हारी,
उस अबोध पर यूँ जुल्म ना कर
मानव होते हुए दानव बनकर,

माँ की छाती सुखी रहेगी
लक्ष्मी तुझसे रूठी रहेगी,
जीवन तुम्हारा दुखमय होगा
ऐसे पापों का भागी बनकर ,

जिस गर्भ का तू सितारा है
अब धन दौलत का पिटारा है,
उस मंदिर में ऐसी बलि ना दे
सांस लेने दे उसे भी थोड़ा खुलकर,


तुतली किलकारियों को क्यूँ तौलते हो
बेटी पर ऐसा क्यूँ बोलते हो,
इतने भी निकम्मे नहीं शायद तुम
जो छोड़ भागो इसे बोझ समझकर,
करेगी रौशन नाम तुम्हारा एकदिन
बेटी होते हुए भी बेटा बनकर......... 




कुन्दन मिश्रा
सहरसा
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