कोई भी व्यक्ति जीवन में अनेक रिश्तों में बंधा होता है. हमारा सुखद जीवन इन्ही रिश्तों के संतुलन पर ही निर्भर करता है. रिश्तों में संतुलन रखना बहुत आसान नही होता है.खास कर लड़कियों के लिए तो ये एक काफी मुश्किल काम है, क्योंकि एक तो उन्हें बहुत सारे रिश्ते सोच समझकर निभाने होते हैं फिर रिश्तों को लेकर वे काफी भावुक भी होती हैं. किसी भी रिश्तों के बनने पर जहाँ लड़कियां आमतौर पर खुश होती हैं वहीं रिश्तों के टूटने का दर्द भी इनके लिए दुखदायी होता है.
    लड़कियों के लिए शादी से पहले और शादी के बाद के रिश्तों में एक बड़ा फर्क होता है. शादी से पहले जहाँ अपने पिता के घर में उसकी एक महत्वपूर्ण भूमिका होती है वहीं शादी के बाद पति के घर की वो धुरी बन जाती है.शादी से पहले जहां एक लड़की बेटी, बहन आदि होती है वहीँ शादी के बाद वो पत्नी, भाभी, चाची, मामी आदि बन जाती है और यहीं से शुरू होता है संतुलन का अभ्यास. कभी-कभी तो बहुत ही सावधानी के साथ भी स्थापित करने के बाद भी मुश्किलें आ जाती है.दरअसल कोई सम्बन्ध सिर्फ इस बात पर निर्भर नही करता है कि सिर्फ हम अच्छा व्यवहार करते हैं, बल्कि यदि सामने वाले की नीयत और व्यवहार अच्छा नही रहता है तो भी हमारे लिए मुश्किलें खड़ी हो जाती है.
   शादी के बाद ससुराल में कदम रखते ही अतीत की यादों के साथ वह भविष्य के सपने बुनना प्रारम्भ कर देती है.यहाँ अजनबी रिश्तों के बीच यदि उसे प्यार और अपनापन मिलता है तो वो आसानी से ससुराल में सामंजस्य बिठा लेती है. यहाँ से धीरे-धीरे वो मायके की बहुत सी यादों को पीछे छोड़ने लगती है. पर उसे एक दर्द का अहसास तब होता है जब वो फिर मायके जाती है.यहाँ अब उसे बहुत कुछ बदला-बदला सा लगता है. अब तक उसके कमरे पर भाई-बहन अपना अधिकार जमा चुके होते हैं. चीजें जिसे वो जान से ज्यादा चाहती थी, अब कहीं कोने में बिखड़े पड़े होते हैं,मानो किसी की नजर में उसकी कोई अहमियत ही नहीं है. अब उसके आगे बढ़ने या कैरियर प्रति माँ-बाप पहले की तरह चिंतित नही रहते हैं, क्योंकि अब ये जिम्मेवारी ससुरालवालों की हो चुकी होती है.ऐसे में एक लड़की अगर सामंजस्य न बिठाए तो यहाँ उसे दर्द का अनुभव होता है.
     ससुराल में सामंजस्य बिठाना तो और भी चुनौती भरा होता है.पति जहाँ पहले माँ के पास ज्यादा समय बिताने में सुख महसूस करता था, अब पत्नी के प्रति जिम्मेवारी निर्वाह करने में माँ को कम समय दे पाता है.कुछ माओं को बेटे का पत्नी के पल्लू से चिपके रहना अखरता है, और यहाँ यहाँ से सास-बहू के रिश्ते में खटास बढ़ने की गुंजायश बन जाती है.दूसरी तरफ पति को नजरअंदाज करना पति-पत्नी के रिश्ते में दरार की वजह हो सकती है, जो वैवाहिक जीवन के लिए सबसे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण हो सकता है. ननद जो पहले घर की धुरी हुआ करती थीबहू के आने से उसके कुछ अधिकार में कटौती हो जाती है. ऐसे हालातों में जहाँ औरत को माँ और ननद के रूप में संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता होती है, वहीं उसे दूसरी ओर बहू या भाभी के रूप में सामंजस्य चुनौती भरा होता है. कभी-कभी लड़कियों का अक्खड़ या रुखड़ा स्वभाव उसे पति और ससुराल वालों की नजरों से गिरा भी देता है.मायके के दम पर अक्खड़पन दिखाना सर्वथा अनुचित है. हमारे समाज में इक्का-दुक्का लड़कियां ऐसी भी हैं, जिनका किसी कारणवश ससुराल छूट गया है और वे ताउम्र मायके में ही रहने को विवश हैं.पर अधिकाँश मामलों में इनके हालत बदतर ही दिखते हैं. पर जिन अधिकाँश लड़कियों ने अपने काम और व्यवहार से ससुराल के लोगों का मन जीत लिया है वे जहाँ ससुराल के लिए एक अभिन्न अंग हैं, मायके में भी उनकी खूब इज्जत देखी जा सकती है. ससुराल में यदि किसी का बर्ताव आपसे लगातार बुरा ही होता है तो इसे ढंग से अपने पति के सामने रखें. याद रखें, बिना वजह आपकी बार-बार चुगली आपको पति समेत सबकी नजरों से गिरा सकता है.
    कुल मिलाकर रिश्तों में संतुलन सुखद जीवन के लिए अत्यंत ही आवश्यक है.संतुलन बनाकर रहना जिस लड़की के स्वभाव में ही निहित है वे जीवन भर ससुराल और मायका दोनों की ही दुलारी बनी रहती है.
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