तू दूर है मुझसे पर पास लगती है
जीने की मेरी एक आश लगती है,
इक तू हीं धरम इक तू हीं करम
माँ! तू मुझको मेरी एहसास लगती है,

अब जब भी बचपन में खोता हूँ
जी भरकर मैं रोता हूँ,
तू ऊँगली थामकर चल रही
यहीं कहीं आसपास सी लगती है
माँ! तू मुझको मेरी एहसास लगती है,

बहुत दिन हो गये तेरे नाक को छुए
कांधे पर सर रखकर भी सोये,
अब जब जब प्यास सी लगती है
माँ! तू मुझको मेरी एहसास लगती है,

मुझको अब ये क्यूँ लग रहा जैसे
तू भी मुझसे ये कहती है,
जब जब तेरी यादों में खोती हूँ
मैं भी जीभरकर रोती हूँ,
तू दूर है मुझसे कोई बात नहीं
मैं हरपल तेरे साथ होती हूँ,

माँ! फैला दे तू अपना आंचल
सर रखकर मैं सो जाता हूँ,
एक अच्छा सा कोई गीत सुना दे
फिर सपनों में खो जाता हूँ,

अब मेरी तो एक ही है दुआ
की जब जब मेरा जीवन हो,
हाथों में तेरी ही ऊँगली
और तेरे घर का ही आँगन हो ,




कुन्दन मिश्रा, संत नगर, सहरसा
2 Responses
  1. बेहतरीन कविता...


  2. बेहतरीन कविता..अमित गौरव और दीपक शुक्ला आपके प्रेरणाश्रोत है...इसलिए वो दोनों भी बधाई के पात्र है.
    धन्यवाद
    कुन्दन मिश्रा


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