तुम आये
किन्तु देर बहुत कर आये
प्रियेतम !
सब साधों को सुला चुकी अब
और करूँ क्या तुमको अर्पण ?
मेरी आँखें सन्यासिन सी
सारे सपने रीते रीते
प्राणों का दीपक रीता
स्नेह रिक्त दीपक से क्या वह
प्रणय.शिखा निकलेगी ??
धरा आकाश भी मिलते हैं क्षितिज में
एक काल्पनिक विन्दु पर
प्रीती की कामायिनी किन्तु ,
खो गयी
अधरों के प्यासे तीरों पर ...
तेरे पैर पखारे पाहुन
नयनों के ये नीर पावन
सब कुछ तो लुटा चुकी
ले लो इन आँखों का सावन ....

- डॉ० शेफालिका वर्मा
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