शिखा को मैं पढ़ती थी, और हर बार सोचती - 'बाप रे, कितना जानती है ये लड़की' . कभी उसके क्वालिफिकेशन को नहीं पढ़ा और दांतों तले ऊँगली दबाती रही. उसकी योग्यता, उसके क्षेत्र को तब जाना जब मेरी बेटी अपराजिता को मास कम्युनिकेशन में एडमिशन के लिए एक प्रोजेक्ट बनाना था और तब मेरी दोनों बेटियों ने उससे मेल के जरिये प्रश्नों के उत्तर मांगे और बिना किसी नानुकुर के शिखा मान गई. एक फॉर्म उसने अपने पतिदेव से भी भरवाकर भेजा ...... यह ब्लॉग का सामीप्य, शब्दों का रिश्ता था.
उसके शब्द में जाना है कि वह बड़ी बेटी है, पर उसके लिखने के अंदाज में, किसी अवार्ड को साझा करने में एक सादगी और चुलबुलापन है, तभी तो - जब भी वह कुछ विशेष सन्दर्भ में बताती है तो मैं मन ही मन कहती हूँ -'बाप रे , कितना जानती है ये लड़की' !
अब एक नज़र उस शिखा की, जिसने अपनी प्रतिभा के साथ जीवन की आपाधापी में समझौता किया, पर वक़्त ही चलकर पास आया और कहा - 'मैं हूँ न' .... उसकी यह उड़ान उसके पापा और अपनों के नाम.
जन्म २० दिसंबर १९७३ को नई दिल्ली में हुआ खानदान के सबसे बड़े बेटे की सबसे बड़ी बेटी थी अत: सभी का भरपूर प्यार मेरे हिस्से आया. पिताजी उत्तर प्रदेश के एक सरकारी विभाग में अधिकारी थे अत :स्कूलिंग पहले पिथोरागड़ फिर रानीखेत के स्थानीय स्कूलों में हुई, जो उस समय उत्तर प्रदेश का ही हिस्सा थे. जानने वाले कहते हैं मुझपर अपने पिताजी के व्यक्तित्व का गहरा असर है. शायद इसलिए बचपन से ही कुछ ऐसा करने की ललक थी कि पापा को मेरे नाम से जाना जाये.स्कूल की सभी गतिविधियों,प्रतियोगिताएं में हिस्सा लिया करती थी. चाहे वह वाद विवाद प्रतियोगिता हो या डांस या फिर खेल और जीता भी करती थी. पढ़ाई में भी अच्छी थी. तो उस छोटे से शहर में अच्छा खासा रोब था. हम तीन बहने थीं और मैं सबसे बड़ी शायद इस बात ने मुझे कुछ ज्यादा महत्वाकांक्षी बना दिया था. घर में दुनिया भर के पत्र- पत्रिकाएं आतीं थीं फिर भी आते ही उन्हें पढने की होड़ सी हुआ करती थी. होली पर हम पिताजी के साथ बैठकर रिश्तेदारों के काव्यात्मक टायटिल बनाया करते थे. शायद वहीँ से साहित्य के अंकुर पनपने लगे थे. परन्तु ज्यादातर बच्चों की तरह मैं भी तब कभी टीचर, कभी एयर होस्टेस तो कभी आई ए एस अफसर बनने के सपने ही देखा करती थी. और इसी दौरान हंसी खेल में अपनी एक तुकबंदी मैंने एक स्थानीय पत्रिका में भेज दी. और घोर आश्चर्य कि वह छप गई. जबकि तब तक यही सुनते आये थे कि पत्र पत्रिकाओं में अनजान और नए लोगों की रचनाएँ नहीं छपा करती. उस रचना के छपने से मेरी सोच का रुख आई ए एस से निकल कर पत्रकारिता पर होने लगा था.. तभी बारहवीं पास करने के बाद रशिया से छात्रवृति का ऑफ़र आया. सभी रिश्तेदारों के यह कहने के वावजूद कि हमारे समाज में लडकियां जर्नलिस्ट नहीं बना करती, यही किसी कॉलेज में दाखिला करा दो, मेरे माता पिता ने मुझे जर्नलिज्म करने के लिए ६ साल के लिए रशिया भेज दिया. और 1991 में , 16 साल की अवस्था में, मैं अपने छोटे से शहर से निकल कर आगे की पढ़ाई करने रशिया चली गई. वहां पत्रकारिता में स्नातक और परास्नातक करने के दौरान मेरे लेख, अमर उजाला, दैनिक जागरण और आज जैसे भारतीय समाचार पत्रों में छपने लगे. उसी दौरान रेडियो मोस्को की हिंदी सेवा से भी बटोर स्टायलीस्ट/ब्रोडकास्टर जुडी रही. फिर वहां से टीवी पत्रकारिता में सर्वोच्च अंकों के साथ "विद ऑनर" डिग्री लेकर वापस आई और भारत में एक टी वी आई (बिजनेस इंडिया ग्रुप) नामक एक न्यूज चैनल में अस्सिस्टेंट न्यूज प्रोडूसर के तौर पर नौकरी करने लगी. परन्तु जैसा कि भारतीय समाज में सोचा जाता है नौकरी लगते ही विवाह के लिए जोर दिया जाने लगा और ३ महीने बाद ही मेरा विवाह एक कम्प्यूटर इंजीनियर से हो गया. फिर जैसे कि होता है पति कि नौकरी के अनुसार कभी अमेरिका तो कभी इंग्लैण्ड के चक्कर हम लगाते रहे और उसमें मेरे कैरियर की आहुति जाती रही. शादी के एक साल बाद ही बेटी का जन्म फिर देश-विदेश आवागमन, पिताजी का आकस्मिक देहांत और फिर बेटे का जन्म. जिन्दगी इतनी तेजी से भाग रही थी कि कभी अपने बारे में सोचने का, पीछे मुड़ कर देखने का मौका ही नहीं मिला. किसी भी काम को पूरी शिद्दत से करने के अपने स्वभाव वश मैंने अपनी गृहस्थी में अपने आप को तन, मन से समर्पित कर दिया. बस कुछ पंक्तियाँ अपनी डायरी के हवाले करती रही जिससे मेरा अस्तित्व बरकरार रहा शायद. जैसा कि कवि बच्चन की ये पंक्तियाँ काफी हद तक मुझे अपनी सी लगती हैं -

जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।

जिस दिन मेरी चेतना जगी मैंने देखा
मैं खड़ा हुआ हूँ इस दुनिया के मेले में,
हर एक यहाँ पर एक भुलाने में भूला
हर एक लगा है अपनी अपनी दे-ले में
कुछ देर रहा हक्का-बक्का, भौचक्का-सा,
आ गया कहाँ, क्या करूँ यहाँ, जाऊँ किस जा?
फिर एक तरफ से आया ही तो धक्का-सा
मैंने भी बहना शुरू किया उस रेले में,
क्या बाहर की ठेला-पेली ही कुछ कम थी,
जो भीतर भी भावों का ऊहापोह मचा,
जो किया, उसी को करने की मजबूरी थी,
जो कहा, वही मन के अंदर से उबल चला,
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला

2005 में लन्दन आने के बाद बच्चे थोड़े बड़े हुए तो अपने लिए थोडा समय मिलने लगा. तभी एक मित्र ने ऑरकुट से परिचय कराया. ऑरकुट की साहित्यिक कम्युनिटी में मैंने अपनी डायरी के पन्ने बांटने शुरू किये और वहां से प्रोत्सहन पाकर ब्लॉग बनाया जहाँ खुले दिल से लोगों की सराहना और प्रोत्साहन मुझे मिला जिसकी मैं हमेशा ऋणी रहूंगी. मेरी रुकी हुई गाड़ी को जैसे अचानक पटरी मिल गई और मैंने अपने बचे हुए समय को, उसे तेल, पानी देने में लगा दिया और फिर वह गाड़ी चल पड़ी.उसके बाद रास्ते अपने आप बनते गए .
आजकल ब्लॉग और कुछ न्यूज़ पोर्टल के अलावा लन्दन में भारतीय उच्चायोग की सांस्कृतिक शाखा नेहरु सेंटर की हिंदी साहित्य की गतिविधियों में सक्रीय रहना शुरू किया. यह शायद मेरा सौभाग्य है कि हर क्षेत्र में लोगों का प्यार, सम्मान मुझे सहज ही प्राप्त हो जाता है. यहाँ भी सभी गुणी जानो का और वरिष्ठ साहित्यकारों का अपनत्व और साथ मुझे भरपूर मिल रहा है. और अब मैं हिंदी की, हिंदी साहित्य की और पत्रकारिता की सेवा में संग्लग्न हूँ.
आज जीवन से बहुत हद तक संतुष्ट हूँ. पूरा जहाँ जीतने की तमन्ना नहीं. बस इतनी सी हसरत है कि ऊपर से जब मेरे पिताजी मुझे देखें तो अपने आसपास के सभी लोगों से कह सकें (जो कि मुझे उम्मीद है कि वहां भी उन्होंने अपने आस पास मजमा लगा रखा होगा) कि देखो ! ये मेरी बेटी है.
प्रकाशित पुस्तकें - एक क़तरा आस्मां ( संयुक्त काव्य संकलन.)
एक संस्मरण प्रकाशनार्थ


--प्रस्तुति: रश्मि प्रभा, पटना.
(http://sameekshaamerikalamse.blogspot.in/)
1 Response
  1. Saras Says:

    शिखाजी को कुछ और जाना ...कुछ और चाह ...आपके माध्यम से ...एक प्रेरणा भी मिली ....


टिप्पणी पोस्ट करें