कखनो काल आंखि में मसानक शून्यता
उतरि जायत अछ
हृदयक रक्त जमि अहिल्या
बनि जायत अछ
भूख क जंगल में
रक्तरंजित शतदल विहुँसैत अछ
तथाकथित
सभ्यता आ संस्कृति स अंतर
क्षत विक्षत भ उठैत अछ ..
तखन मोने उठैत अछ
एकटा प्रश्न
जनक सँ पुछवा ले एकटा प्रश्न
अहाँ किएक
सीता संग एतेक सनेस देलों
राजक राज लुटाय
नारीकें दहेजक आगि में झोकि देलों
किएक दहेज़ -परम्परा कें जनम देलों ?
मोन
ओनाइत अछ पुनः
सीता सँ पुछवा लेल एक प्रश्न...
सीता !
अहाँ किएक स्वीकारलों रामक
अग्निपरीक्षा कें
शक्ति रहितो
शोषित बनि वनक निर्वासन के
अहाँ किएक मौन परम्परा के जनम देलों
किएक
नारी जीवन शोक संतप्त केलों .....??
आय राम राजक लीला देखू
घरे घर धोबी
गली गली रावण भरि गेल
नहि जानि
राम कत चलि गेलाह ........
व्याकरण केर अपवाद बनि गेलाह ......


डॉ. शेफालिका वर्मा
1 Response

टिप्पणी पोस्ट करें