मेरी जाँ ...
मेरे जिस्म के जर्रे-जर्रे में तुम मनिहारी के पीर मजार के पीर बाबा सी काबिज़ रही हो, यह जानती हो अभी भी तुम। याद है तुम्हें, जब कभी मैं अंबेडकर चौक के भीड़ में खो जाता था तो तुम ऑटो ड्राइवर की तरह अपने इस पैसेंजर को ढूंढ लेती थी। मैं अक्सर तुमसे रूठा करता था और इस रुठने-मनाने के किस्से में हमारा कुछ इश्क गंगा की तेज लहरों सा बाहर निकल आता था तो कुछ इश्क हटिया घाट के किनारे पर अपने अंदर हीं कहीं गुम हो जाता था। तुम बस स्टैंड के करीब की गली में पैदा हुई सरगम सी थी तो मैं शिव मन्दिर के घड़ी घन्ट सा अपनी धुन में बजते रहने वाला एक धुन सा था।

जाना..! जब भी तुम कॉलोनी के ग्राउंड सी गोल मोल बातें करती थी तो मैं उन बातों की कच्ची सड़क में खो कर ताजमहल की तरह अपनी मुहब्बत का एक नया ख्वाबमहल बना देता था।
लेकिन उसी बीच चोटिकटवा वाला कीड़ा उड़ते हुए तुम्हारे कलर कराए हुए बालों में जा छुपा और मेरी मोहब्बत को बिना वजह एक झटके में तुम्हारे रूह से काट कर अलग कर दिया। मोहब्बत की आड़ में मनिहारी नगर परिषद में हुए घोटाले सा हीं किस्सा हुआ मेरे साथ, पर फ़िर भी कहने को तो कुछ दिनों के लिए हीं सही मगर तुम्हारे चकाचौंध LED लाइट में हमने अपने इश़्क को चखा तो था हीं।

ये मेरी मूर्खता हीं है न देखो, तुम रेलवे स्टेशन पर बने ओवरब्रिज सी अपडेटेड हो आगे निकल गयी हो तो वही मैं तुम्हारे परबल रूपी झूठ के ओवर लोडेड टमटम सा गंगा घाट के कीचड़ों में अब तक फसा पड़ा हूँ ।

बस आखिरी में इतना हीं कहना चाहूँगा कि देखना कहीं गंगा रूठ ना जाए, तुम्हारे कुछेक अपनों के झूठे गुरुर का बल्ब low वोल्टेज में भी फ्यूज हो ना जाए,  क्योंकि तुमने मुझे नफरत का नहीं बल्कि अपनी हाई वोल्टेज वाली मोहब्बत का 440 volt वाला झटका दिया है।

हनी सिंह और बादशाह के गानों की दीवानी हो तुम लेकिन कभी फुर्सत में जगजीत सिंह का यह गजल सुनना, शायद तुम्हें कुछ समझ आ जाए-

"इश्क क्या है, इश्क इबादत
इश्क है इमान
इश्क जगाये पत्थर में भी
दिल में हो जो अरमान,
इश्क में मरना इश्क में जीना
इश्क का दामन छोड़ कभी ना
इश्क को जिसने जान लिया है
उसने रब को मान लिया है।"

 
कुंदन मिश्रा
B.Tech (electronics and communication)
लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी,पंजाब
संतनगर, सहरसा
1 Response
  1. Kisi ne shi hi kha hai katil aur kawi dono diwana hi hota hai


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