बहुत दिनक बाद
मेला में
गाम जाइत छलौ ।
बस पर
कल्पना में
संगी सब कें
देखैत
मोन परैत अछि
संजू, सरिता
कमलि, विमली
बुधनी संग मे
दुखनी आ बिजली ।

धुरा माइट खेलैत
साग तोरैत
दूध पहुँचबैत
बकरी चरबैत
मौनी बुनैत
कौनी मिरैत।
मुदा,
दस बजतहि
अपन अपन
रोजगार के
छोरैत
गामक स्कूल मेँ
पहुँच जाइत अछि ।

आजुक
सरकार द्वारा
अनुदानित एकेरंग
वस्त्र नञि,
खिचङी के
भोज नञि
कियो आबय वा
नञि आबय
तकर कोनो
खोज नञि।
सब के
अपन अपन
औकातक अनुकूल
विविध रंगक फराक ।
ककरो फाटल
ककरो चेफरी साटल
ककरो बकरी सँ
चिबायल
ते ककरो
तेलचट्टा सँ चाटल
ककरो केश
डोरि सँ बान्हल
ते ककरो उजरल
कियो गोर
तेँ कियो
कार अछि,
मुदा सब
निर्विकार अछि ।

ताहि दिन
जातिक कोनो
बोध नञि
गाम पर जौ
भिन्नता
तेँ स्कूल मे
विरोध नञि।
मुदा आब
हमर स्कूलक संगी
जाइत मे
बँटल अछि
कियो बढल तेँ
कियो घटल अछि
कियो सवर्ण
तेँ कियो
दलित अछि
ए पी एल आ
बी पी एलक
झगरा मेँ
गाम
दलमलित अछि ।

जाहि दलक
ओ लोक थिक
सएह ओकर
भक्षक अछि
आरक्षण पर
आरक्षण
किन्तु कहाँ
ककरो कियो
संरक्षक छैक ।।।


 स्वाती शाकम्भरी
सहरसा
3 Responses
  1. बड्ड नीक. एहिना लिखैत रहू, माय सरस्वती के कृपा बनल रहे, नित दिन.




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