सोचती हूँ 
क्यों नहीं है 
स्त्री का कहीं 
कुछ भी......
जिसे अपना 
मात्र अपना कह सके 
न रूप 
न रंग 
न स्वाद 
न गंध 
न शक्ति 
न सामर्थ्य 


आता है सब कुछ 
छनकर पुरुष दृष्टि से  
सीने से बाहुबल से 
या फिर उच्छिष्ठ होकर 

आखिर कब तक चलेगा सिलसिला यह?



डॉ० गायत्री सिंह
इलाहाबाद 
4 Responses
  1. आता है सब कुछ
    छनकर पुरुष दृष्टि से
    सीने से बाहुबल से
    या फिर उच्छिष्ठ होकर----bahut khub



  2. sweta azad Says:

    bahut acchi kavita hai.


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