कृष्ण अर्जुन संवाद

अर्जुन की दुविधा


हरि पथ प्रदर्शक बनें
इस अंधकार मैं मेरी ज्योति बनें
क्या पूर्ण होगी मेरी कामना
इस जीवन काल मे ।
चाहता हूँ मैं
कि युध्भूमि फिर सजे
जिसमे
ले सकूं मैं
प्रतिशोध
मैं
उस कापुरुष दुर्योधन से
उस निर्लज्ज दुशाशन से
उस कपटी जुआरी शकुनी से
और
उस मूक राजसभा से
जो दे रही थी खुली छूट
अपने मौन से ।
बताइए केशव
क्या देख पाउँगा इनके शव
गिद्धों के भोज में ?
क्या ऐसा होगा ,
कि आने वाली पीढियां
ला खड़ा करेंगी मुझे
कायारों की कतार में ??
बताइए केशव...


कृष्ण उवाच

हे पार्थ !
माना हुआ है यह अन्याय-अनर्थ,
लेकिन नहीं जायेगा यह क्रोध तुम्हारा व्यर्थ,
होता है इन सब घटनाओं का कुछ न कुछ अर्थ,
निराश होकर करो न समय व्यर्थ ।
हे धनञ्जय !
न सोचो जय – पराजय ।
यह समय,
नहीं है प्रतिशोध का
वरन, 
अपने आप को तैयार करने का
दिव्यास्त्र की खोज का
जो है शोभा
देवेन्द्र के तूणीर का
करो तपस्या
क्योंकि,
अभी येही है तुम्हारा
विशुद्ध कर्तव्य ।
तुम
करो न चिंता शेष की
क्यूंकि धरती भी प्यासी
है उन दुराचारियों के लहू की ।
जबतक तुम होगे नहीं
रहेगा बालक अभिमन्यु मेरे पास ही
लड़ेगा युद्ध में वह तुम्हारे साथ
तुम्हारे कंधे के पास ही...


अंकुर पाण्डेय 
3 Responses
  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...


  2. क्या ऐसा होगा ,
    कि आने वाली पीढियां
    ला खड़ा करेंगी मुझे
    कायारों की कतार में ??
    बताइए केशव..adbhut---vartman ka sach


  3. न सोचो जय – पराजय ।
    यह समय,
    नहीं है प्रतिशोध का
    वरन,
    अपने आप को तैयार करने का


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